दीपा शर्मा, गाजियाबाद : लाल क्वार्टर स्थित शिव चंडी मंदिर का पुजारी परिवार परिसर में ही बनी श्रीराम गोशाला में करीब दो डेढ़ सौ गायों और बछड़ों का लालन-पालन कर रहा है। परिवार के सभी सदस्य गायों की सेवा करते हैं। पुजारी नंदकिशोर शर्मा ने बताया कि चार पीढ़ी से उनका परिवार इस मंदिर में सेवा में लगा हुआ है। पहले दो-चार गायें ही होती थीं। घर में गाय होने की वजह से बचपन से ही उनका भी गोसेवा के प्रति रुझान है। नौकरी के लिए उन्हें बाहर जाना पड़ा था, लेकिन 1999 से नौकरी छोड़कर वह पूरी तरह से गोसेवा में लगे हैं। वैसे तो उनके बच्चे निखिल शर्मा, आकाश शर्मा, निधि शर्मा सभी पढ़ाई के साथ गोशाला में मदद करते हैं, लेकिन संचालन में उनकी छोटी बेटी छाया शर्मा का सबसे ज्यादा योगदान है जो एलएलबी द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं। ---

गायों और मंदिर की सेवा के लिए छोड़ दी सरकारी नौकरी

नंदकिशोर शर्मा ने बताया कि पहले पिताजी राम चरण शास्त्री मंदिर में रहते थे, लेकिन रंजिशन भाई की हत्या के बाद घर की परिस्थितियों को देखते हुए सेना से नौकरी छोड़नी पड़ी। इसके बाद बैंक में नौकरी की, लेकिन नौकरी के साथ गायों की सेवा संभव नहीं होने की वजह से नौकरी छोड़ दी। वहीं मोदीनगर में रहने वाले उनके जीजा अरुण भारद्वाज भी निजी कंपनी में अच्छे पद पर थे। अरुण कुमार का कहना है कि नौकरी की तो रुपया तो बहुत आता था, लेकिन मन को सुकून नहीं था। इसलिए वह भी करीब पांच साल से दिन में गायों की सेवा के लिए आते हैं।

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पर्यावरण संरक्षण में कर रहे मदद

ज्यादातर सब्जी मंडी में पड़ी रह जाने वाली सब्जी और पत्ते सड़ने लगते हैं। इससे गंदगी होने के साथ बदबू फैलती है। गायों को खिलाने के लिए सब्जी मंडी में पड़ी रह जाने वाले सब्जियों और गोभी के पत्ते आदि को लाया जाता है। इससे दो फायदे होते हैं। एक तो गायों बहुत ही चाव से हरी सब्जियों को खाती हैं और दूसरे इससे मंडी में सब्जी और पत्ते साफ हो जाते हैं और गंदगी नहीं फैलती।

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खाद के उपयोग के लिए की अपील

नंद किशोर शर्मा ने बताया कि करीब डेढ़ सौ गायों का इतना गोबर हो जाता है उसे कहां फेंके या किसको दें समझ नहीं आता। इतनी आर्थिक साम‌र्थ्य नहीं हो पा रही है कि खुद खाद के उपयोगी बनाने के लिए सिस्टम लगा सकें या खेती कर सकें। गोबर से बारिश में ज्यादा परेशानी हो जाती है और जगह भी काफी ज्यादा घिरी हुई है। उन्होंने अपील की है कि किसान उनके गोबर उठवाकर ले जाएं और खेतों में देशी खाद का उपयोग करें। इसके बदले वैसे तो उनकी कुछ भी मांग नहीं हैं, लेकिन गायों के लिए वह चारे आदि की कुछ मदद कर सकते हैं।

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