जिले की नई बस्ती की खासियत है कि यहां आपको सब कुछ पुराना मिलेगा। यहां की थोक दवा मार्केट छह दशक पुरानी है, तो यहां बने मकान ब्रिटिशकाल के हैं। खंडहर हो चुके अधिकांश मकान आज भी उस दौर की कारीगरी की कहानी बयां कर रहे हैं, लेकिन दवा व्यापारी आज भी पुरानी समस्याओं से जूझ रहे हैं। 275 दुकानों वाले इस बाजार में एक भी शौचालय नहीं है। दो साल से दुकानों की करीब 10-11 गलियों का खड़ंजा उखड़ा है। पार्किंग के इंतजाम नहीं है और पूरे दिन जाम लगा रहता है। दैनिक जागरण के आयुष गंगवार मंगलवार को नई बस्ती पहुंचे तो थोक दवा व्यापारियों ने मूलभूत सुविधाओं के साथ आनलाइन दवा बाजार की मुखालफत की और मुखर होकर अपने मुद्दे बताए। पेश हैं व्यापारियों से हुई चर्चा के कुछ अंश..

---------- जीटी रोड पर शंभू दयाल इंटर कालेज के बाद बायीं ओर पहले मोड़ से अंदर नई बस्ती के लिए जाते हैं। नई बस्ती की मुख्य सड़क के ओर चंद दुकान और पुराने मकान हैं तो दूसरी ओर बड़ी संख्या में दवाओं की दुकान हैं, जहां पूरे दिन दुकानदार अपने काम में मशगूल रहते हैं। गाजियाबाद केमिस्ट एसोसिएशन के कार्यालय पर अध्यक्ष राजदेव त्यागी और राजेश पचौरी बैठे थे। चुनाव को लेकर बात की तो आनलाइन दवा बाजार को दोनों ने अपना बड़ा मुद्दा बताया। आवाज सुनकर आसपास की दुकान से यशवनी कुमार, अतुल कटारिया, अरुण शर्मा, अमित बंसल और अनिल गुप्ता समेत 4-5 व्यापारी और चर्चा में शामिल हो गए।

राजदेव त्यागी ने कहा कि आनलाइन दवा कारोबार में बड़ी कंपनी कूद गई हैं, जो कंपनियों का पूरा स्टाक खरीदने की क्षमता रखती हैं। शुरुआत में 25-30 फीसद की छूट देकर ये कंपनी थोक व खुदरा दवा व्यापारी को खत्म करेंगी और फिर मनमाने पैसे वसूलेगी। सभी प्रत्याशियों से पहला सवाल यही होगा कि आनलाइन दवा बाजार पर रोक के हमारे मुद्दे को वे कितनी मजबूती के साथ रखेंगे। अनिल गुप्ता ने दवाओं के आनलाइन बाजार से युवाओं में नशे की लत को बढ़ावा देने वाला भी बताया। डिप्रेशन और नींद की दवा खुदरा व्यापारी चिकित्सक के सलाह के बिना नहीं देते। आनलाइन इन दवाओं को खरीदने के लिए वेबसाइट की ओर से खरीदार को चिकित्सक के नाम पर काल करते हैं और नींद न आने की बात पर ही दवाएं घर पहुंचा दी जाती हैं। राजदेव त्यागी ने अनिल गुप्ता की हां में हां मिलाते हुए कहा कि अभिनेता सुशांत सिंह भी लंबे समय तक इसी तरह आनलाइन डिप्रेशन की दवा खाते रहे थे। राकेश पचौरी ने कहा कि पानी और सीवर की लाइन डालने को दो साल पहले गलियों का खड़ंजा उखाड़ा गया था, जो आज तक इसी हालत में है। प्रत्याशियों को इस बारे में पुख्ता आश्वासन देना होगा। शैलेश त्यागी का कहना है कि आज के दौर में भी यहां सार्वजनिक शौचालय नहीं है। 275 दुकानों पर रोजाना हजारों खरीदार आते हैं, जो इधर-उधर खुले में लघुशंका करते हैं। ऐसे में गंदगी व बदबू रहती है। अजय खन्ना ने अपने मुद्दों से इतर आमजन से जुड़ी बात छेड़ी। उन्होंने कहा कि पहले मुख्यमंत्री से की हर शिकायत पर संज्ञान लिया जाता था। आज सीएम पोर्टल पर चाहे जितनी शिकायत करो, कोई सुनवाई नहीं होती। यमुना एक्सप्रेस-वे समेत सभी बड़े हाईवे पर पुलिस की मौजूदगी नहीं दिखती। हाईवे पर सुरक्षा बढ़ाना भी उनके लिए बड़ा मुद्दा है।

अमित बंसल कहते हैं कि कर आम आदमी देता है, व्यापारी पर इसका असर नहीं पड़ा। बावजूद इसके उनका मुद्दा दवाओं पर 12-18 प्रतिशत की दर से लगने वाला जीएसटी है। पहले वैट के रूप में हर दवा पर पांच फीसद कर लगाया जाता था। आज आम दवाओं पर 12 और विटामिन व मिनरल समेत अन्य सप्लीमेंट्री दवाओं पर 18 फीसद कर लगाया जा रहा है, जो वापस लेना चाहिए। अरुण शर्मा कहते हैं कि कैंसर, डायबिटीज, टीबी व गुर्दा रोगियों के काम आने वाली जीवनरक्षक दवाओं को कर मुक्त करना चाहिए। इन पर भी पांच प्रतिशत टैक्स लगाया जा रहा है। थोक दवा व्यापारियों ने चुनावी चौपाल में अपने मुद्दे जितने स्पष्ट तरीके से रखे, उससे साफ है कि किसी भी प्रत्याशी के लिए इनका वोट पाना आसान नहीं होगा। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि प्रत्याशी यहां किस रणनीति के साथ पहुंचते हैं।

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