रमजानुल मुबारक के महीने में कुरआन शरीफ नाजिल हुआ। यह दुनिया की सबसे पाक और भलाई के रास्ते पर ले जाने वाली किताब है। यह महीना हम सबको नेकियों का मौका देता है। हजरत मुहम्मद के मुताबिक रोजा बंदों को जब्ते नफ्स की तरबियत देता है और उनमें परहेजगारी पैदा करता है। हम सब जिस्म और रूह दोनों के समन्वय के नतीजे हैं। आमतौर पर हमारा जीवन जिस्म की जरूरतों, भूख प्यास आदि के गिर्द घूमता रहता है। रोजे में खाना और पीना छोड़ने का मकसद यह है कि आप दुनिया के भूखे और प्यासे लोगों का दर्द समझ सकें। रोजे में परहेज, आत्म संयम और जकात का मकसद यह है कि आप अपनी जरूरतों में थोड़ी कटौती कर समाज के गरीब लोगों की जरूरतें पूरी करें। रोजा सिर्फ मुंह और पेट का ही नहीं, आंख, कान, नाक और जुबान का भी होता है। यह सादगी और पाकीजगी की शर्त है। रमजान रोजेदारों की रूह और खुद के सुधार का मौका देता है। दूसरों को नसीहत देने के बजाय अगर हम अपनी कमियों को पहचान कर उन्हें दूर कर सकें तो हमारी दुनिया ज्यादा खूबसूरत होगी।

- हाजी अफसर, गाजियाबाद

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Jagran

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप