साहिबाबाद, जागरण संवाददाता। कश्मीर के श्रीनगर से घर - कारोबार उजड़ने के बाद इंदिरापुरम के ज्ञान खंड चार में रहने वाले पीएन बट्ट ने सैकड़ों पौधे लगाकर पार्क को विकसित किया। पिछले तीन साल से पार्क की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) ने शिकायतों के बाद भी ध्यान नहीं दिया। ऐसे में 65 वर्षीय पीएन बट्ट ने हिम्मत बांधी और अकेले ही पार्क के सुंदरीकरण में जुट गए। उन्होंने कड़ी मेहनत से 15 दिन में बदहाल पार्क को सुंदर बना दिया। अब पार्क में पत्तियों से खाद भी बना रहे हैं।

कश्मीर के बगीचों में पले-बढ़े, प्रकृति से है लगाव

कश्मीर के श्रीनगर स्थित शालीमार हार्वन साइट के पुष्कर नाथ बट्ट (पीएन बट्ट) ने बताया कि उनके पिता द्वारकानाथ बट्ट के पास तीन सौ एकड़ जमीन, 10 से अधिक बाग थे। उनके पिता एग्रो इंडस्ट्री चलाते थे। इग्लैंड से फूल, फल और सब्जी के बीज मंगवाकर बेचते थे। उनके यहां 14 किस्म के सेब, पांच तरह के आलू बुखारे, पांच तरह की नासपाती, अखरोट, बादाम आदि पैदा होते थे। ऐसे में उन्हें बचपन से ही पेड़ पौधों और प्रकृति से लगाव है। उनकी श्रीनगर में दो कोठी और करोड़ों रुपये का कारोबार था।

जला दी कोठी, उजाड़ दिया कारोबार

पीएन बट्ट ने बताया की कश्मीरी मुस्लिमों ने सन 1990 में उनकी दोनों कोठियों को लूटकर उसमें आग लगा दी। उनका कारोबार उजाड़ दिया। उनके दो जीजा, मामी और शिक्षक की निर्मम हत्या कर दी गई। ऐसे में वह करोड़ों की सपत्ति महज तीन लाख रुपये में बेचकर रात में करीब 30 लोगों के साथ श्रीनगर छोड़कर जम्मू चले गए। सदमे से उनकी मां इंद्रावती की मौत हो गई। बाद में पीएन बट्ट पिता व बच्चों के साथ दिल्ली में आकर रहने लगे। उन्होंने मेडिकल से बीएससी और एमएससी की है। ऐसे में पहले एक अमेरिका की कंपनी में नौकरी की। बाद में ओखला की एक कंपनी में महाप्रबंधक रहे। वर्ष 2000 में उनके पिता की मौत हो गई।

बनाया था पार्क, उजड़ते नहीं देखा गया

पीएन बट्ट ने बताया कि वर्ष 2000 में जब वह पत्नी बच्चों के साथ इंदिरापुरम के ज्ञान खंड चार में आए तो जीडीए ने पास में पार्क बनाने के लिए जगह छोड़ी थी लेकिन लोग उसपर मलबा डाल जाते थे। यहां सिर्फ एक नीम का पेड़ था। प्रकृति से लगवा इतना था कि उन्होंने जीडीए अधिकारियों से मदद मांगी और मलबा हटवाया। इसके बाद सैकड़ों नीम, पीपल, बरगद, फूल और हरियाली वाले पौधे लगाए। इस तरह उन्होंने पार्क विकसित किया। जीडीए अधिकारियों ने उनकी सराहना की। पीएन बट्ट का कहना है कि ढलती उम्र के साथ अब उनकी बाजुओं में इतनी ताकत नहीं कि वह बहुत कुछ कर सकें लेकिन उनकी बूढ़ी आंखें पार्क को बदहाल होते नहीं देख सकीं। उन्होंने पेड़, पौधों की छंटाई, पार्क की सफाई में अकेले ही जुट गए। उन्हें देख सोसायटी के सुरक्षा गार्ड नेत्रपाल ने भी मदद की। 15 दिन में बदहाल पार्क की काया पलट दी। पार्क में निकली पत्तियों से वह खाद भी बना रहे हैं, जिन्हें पौधों में डालेंगे।

Edited By: Prateek Kumar

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