हसीन शाह, गाजियाबाद। लॉकडाउन में दूसरे शहरों से अपने घर लौटे कामगारों को मनरेगा के तहत रोजगार देने का आदेश जारी हुआ है। मजदूरी भी 181 से बढ़ाकर 201 रुपये कर दी है। मगर पिछले पांच साल से एक भी मजदूर ने मनरेगा के तहत काम नहीं किया है। लॉकडाउन की हालत में भी जनपद में मनरेगा में पंजीकृत 17 हजार कामगारों में से एक भी व्यक्ति काम करने को तैयार नहीं है।  क्योंकि, अब उनको पहले से ज्यादा रोजगार और मजदूरी की रकम मिल रही है।

जनपद की 161 ग्राम पंचायतों में मनरेगा के 17 हजार कामगार पंजीकृत हैं। पिछले पांच साल से एक भी कामगार ने न तो मनरेगा के तहत काम किया है और न ही किसी नए व्यक्ति ने अपना पंजीकरण कराया है। जनपद में रोजगार की कमी नहीं होने के कारण यहां पर प्रवासी कामगारों की संख्या बहुत कम है। पूरे जनपद में महज 237 प्रवासी कामगार हैं। 

गाजियाबाद के मजदूर बड़ी संख्या में दिल्ली और नोएडा भी काम करते हैं। मगर इनकों प्रवासी नहीं माना गया है। ये लोग काम कर रोज घर लौट आते हैं। सरकार चाहती है कि जो लोग लॉकडाउन के दरमियान दूर दराज के इलाकों से गाजियाबाद लौटे हैं, उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। विभाग ने मनरेगा के तहत रोजगार देने के लिए कामगारों को सूचित किया है। मगर किसी भी कामगार ने मनरेगा के तहत काम करने की हामी नहीं भरी है।

 अफसरों का कहना है कि कामगारों को फिर से रोजगार मिलना शुरू हो गया है। लॉकडाउन में मजदूरी भी बढ़ गई है। लॉकडाउन से पहले 400 रुपये मजदूरी मिल रही थी। मगर अब उन्हें 500 से 600 रुपये मजदूरी मिल रही है। ऐसे में मनरेगा में काम क्यों करें। 

इसलिए मिल रही ज्यादा मजदूरी : जिले में कृषि व अन्य कार्यों में बड़ी संख्या में बाहर के श्रमिक काम करते थे। लॉकडाउन के कारण कामगार अपने घर लौट गए हैं। ऐसे में स्थानीय कामगारों ने अपनी मजदूरी में इजाफा कर दिया है। ऐसे वह मनरेगा के तहत 201 रुपये प्रतिदिन काम नहीं करना चाहते हैं। जनपद में 161 ग्राम पंचायते हैं मनरेगा में 309 रुपये प्रतिदिन पारिश्रमिक तय है। 

डीडीओ भालचंद्र त्रिपाठी का कहना है कि कामगार मनरेगा की मजदूरी पर सवाल उठाते हैं। कामगार श्रम विभाग का हवाला देते हुए प्रतिदिन 500 रुपये मजदूरी करने की मांग करते हैं। वह मनरेगा के तह शोषण करने का आरोप लगाते हैं। श्रम विभाग ने 309 रुपये प्रतिदिन मजदूरी तय की है। डीडीओ भालचंद्र त्रिपाठी ने कहा कि  जनपद में 17 हजार कामगार पंजीकृत हैं। मगर पांच साल से एक भी कामगार ने काम नहीं किया है। क्योंकि यहां पर रोजगार के अवसर अधिक हैं। दूसरी जगह पर उन्हें मनरेगा से ज्यादा मजदूरी मिल जाती है।

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