साहिबाबाद (गाजियाबाद) [अवनीश मिश्र]। 1857 में हुए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का जब भी जिक्र होता है, गाजियाबाद का हरनंदी तट जरूर याद किया जाता है। 30 और 31 मई 1857 को यहां क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सेना को शिकस्त दी। दो अंग्रेजी सेनाओं को मिलने से रोका। इससे अंग्रेजों का दर्प (घमंड) चूर-चूर हो गया। मेरठ रोड पर बनी अंग्रेजों की कब्रें आज भी इसकी गवाही दे रही हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के अस्सिटेंट प्रोफेसर डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया है कि 10 मई 1857 को मेरठ में देसी सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया और रात में ही वो दिल्ली कूच कर गए थे। 11 मई को उन्होंने अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया। और अंग्रेजों को दिल्ली के बाहर खदेड़ दिया। अंग्रेजों ने दिल्ली के बाहर रिज क्षेत्र में शरण ले ली। तत्कालीन परिस्थितियों में दिल्ली की क्रांतिकारी सरकार के लिए मेरठ क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण था। कारण मेरठ से कोतवाल धनसिंह गुर्जर द्वारा विद्रोह की शुरूआत हुई थी।

पूरे मेरठ क्षेत्र में सहारनपुर से लेकर बुलंदशहर तक का हिंदू-मुस्लिम, किसान-मजदूर सभी आमजन, इस अंग्रेज विरोधी संघर्ष में कूद पड़े थे। ब्रिटिश विरोधी संघर्ष ने यहां जन आंदोलन और जनक्रांति का रूप धारण कर लिया था। मेरठ क्षेत्र दिल्ली के क्रांतिकारियों को जन, धन और अनाज की भारी मदद पहुंच रहा था। स्थिति को देखते हुए मुगल बादशाह ने मालागढ़ के नवाब वलीदाद खान को इस क्षेत्र का नायब सूबेदार बना दिया। उसने इस क्षेत्र की क्रांतिकारी गतिविधियों को गतिविधियों को गति प्रदान करने के लिये दादरी में क्रांतिकारियों के नेता राजा उमराव सिंह गुर्जर से संपर्क साधा। उन्होंने दिल्ली की क्रांतिकारी सरकार का पूरा साथ देने का वादा किया।

क्रांतिकारियों ने हरनंदी के पुल को तोड़ा

डॉ. प्रदीप कुमार बताते हैं कि मेरठ में अंग्रेजों के बीच अफवाह थी कि विद्रोही सैनिक, बड़ी भारी संख्या में मेरठ पर हमला कर सकते हैं। अंग्रेज मेरठ को बचाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे। कारण मेरठ पूरे डिवीजन का केंद्र था। मेरठ को आधार बनाकर ही अंग्रेज इस क्षेत्र में क्रांति का दमन कर सकते थे। अंग्रेज इस संभावित हमले से रक्षा की तैयारी में जुए गए। मेरठ होकर वापस गए दो व्यक्तियों ने बहादुर शाह जफर को बताया कि एक हजार यूरोपिय सैनिकों ने सूरज कुंड पर एक किले का निर्माण कर लिया है। इस प्रकार दोनों और युद्ध की तैयारियां जोरों पर थी। 20 मई 1857 को क्रांतिकारियाें ने हरनंदी नदी का पुल तोड़ दिया, जिससे दिल्ली के रिज क्षेत्र में शरण लिए अंग्रेजों का संपर्क मेरठ और उत्तरी जिलों से टूट गया।

भारी सेना के साथ पहुंची अंग्रेजी सेना

डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया है कि इस बीच युद्ध का अवसर आ गया, जब दिल्ली को दोबारा जीतने के लिए अंग्रेजो की एक विशाल सेना प्रधान सेनापति बर्नाड़ के नेतृत्व में अंबाला छावनी से चल पड़ी। सेनापति बर्नाड ने दिल्ली पर धावा बोलने से पहले मेरठ की अंग्रेज सेना को साथ ले लेेने का निर्णय किया। 30 मई 1857 को जनरल आर्कलेड विल्सन की अगुवाई में मेरठ की अंगे्रज सेना बर्नाड का साथ देने के लिए गाजियाबाद के निकट हरनंदी नदी के तट पर पहुंच गई। इन दोनों सेनाओं को मिलने से रोकने के लिए क्रांतिकारियों और आम जनता ने भी हरनंदी नदी के दूसरी तरफ मोर्चा लगा रखा था। जनरल विल्सन की सेना में 60वीं शाही राइफल्स की चार कंपनियां, कार्बाइनरों की दो स्क्वाड्रन, हल्की फील्ड बैट्री, ट्रुप हार्स आर्टिलरी, एक कंपनी हिंदुस्तानी सैपर्स माईनर्स, सौ तोपची व हथगोला विंग के सिपाही थे।

हरनंदी तट पर हुआ भीषण युद्ध

डॉ. प्रदीप बताते हैं अंग्रेजी सेना अपनी सैनिक व्यवस्था बनाने का प्रयास कर रही थी कि क्रांतिकारियों ने उन पर तोपों से आक्रमण कर दिया। क्रांतिकारियाें की कमान मुगल शहजादे मिर्जा अबू बक्र दादरी के राजा उमरावसिंह व नवाब वलीदाद खान के हाथ में थी। क्रांतिकारियों में बहुत से घुड़सवार, पैदल और घुड़सवार तोपची थे। भारतीयों ने तोपे पुल के सामने एक ऊंचे टीले पर लगा रखी थी। क्रांतिकारियों की गोलाबारी ने अंग्रेजी सेना के अगले भाग को क्षतिग्रस्त कर दिया। अंग्रेजों ने रणनीति बदलते हुए क्रांतिकारियों के बाएं भाग पर जोरदार हमला बोल दिया।

इस हमले के लिए अंग्रेजों ने 18 पौंड के तोपखाने, फील्ड बैट्री और घुड़सवार तोपखाने का प्रयोग किया। इससे क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा और उसकी पांच तोपें वही छूट गई। जैसे ही अंग्रेजी सेना इन तोपों को कब्जे में लेने के लिए वहाँ पहुंची, वहीं छुपे एक भारतीय सिपाही ने बारूद में आग लगा दी, जिससे एक भयंकर विस्फोट में अंग्रेज सेनापति कैप्टन एण्ड्रूज और 10 अंग्रेज सैनिक मारे गए। इस प्रकार इस वीर भारतीय ने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजों से भी अपने साहस और देशभक्ति का लोहा मनवा लिया।

एक अंग्रेज अधिकारी ने लिखा था कि ”ऐसे लोगों से ही युद्ध का इतिहास चमत्कृत होता है। अगले दिन भारतीयों ने दोपहर में अंग्रेजी सेना पर हमला बोल दिया यह बेहद गर्म दिन था और अंग्रेज गर्मी से बेहाल हो रहे थे। भारतीयों ने हरनंदी नदी के निकट एक टीले से तोपों के गोलों की वर्षा कर दी। अंग्रेजों ने जवाबी गोलाबारी की। दो घंटे चली इस गोलाबारी में लैफ्टिनेंट नैपियर और 60वीं रायफल्स के 11 जवान मारे गए और बहुत से अंग्रेज घायल हो गए। अंग्रेज भारतीयों से लड़ते-लड़ते पस्त हो गए। हालांकि अंग्रेज सेनापति जनरल विल्सन ने इसके लिए भयंकर गर्मी को दोषी माना।

भारतीय भी एक अंग्रेज परस्त गांव को आग लगाकर सुरक्षित लौट गए। एक जून 1857 को अंग्रेजों की मदद को गोरखा पलटन हरनंदी तट पर पहुंच गई। फिर भी अंग्रेजी सेना आगे बढ़ने का साहस नहीं कर सकी और बागपत की तरफ मुड़ गई। इस प्रकार भारतीयों ने 30, 31 मई 1857 को लड़े गए हरनंदी के युद्ध में साहस और देशभक्ति की एक ऐसी कहानी लिख दी, जिसमें दो अंग्रेजी सेनाओं के ना मिलने देने के लक्ष्य को पूरा करते हुए, उन्होंने अंग्रेजी के घमंड को चूर-चूर कर दिया।

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