मामला एक-

बुधवार पूर्वाह्न 11.15 बजे बरहन निवासी संजीव त्वचा की बीमारी का इलाज कराने जिला अस्पताल आए थे। डॉक्टर ने अस्पताल की एक दवा लिखी, तीन मेडिकल स्टोर से खरीदने के लिए कहा। उन्हें चार सौ रुपये खर्च करने पड़े। -मामला दो-

दिन के करीब 12 बजे हड्डी रोग विशेषज्ञ वार्ड में राउंड पर बताए गए और उनकी ओपीडी में बैठा लड़का बाहर की दवाएं लिख रहा था। इस तरह के आधा दर्जन बाहरी युवक अलग-अलग डॉक्टरों के साथ ओपीडी में बैठकर बाहर की दवाएं लिखते हैं। जागरण संवाददाता, फीरोजाबाद: जी हां, ये हकीकत है जिला अस्पताल की। यहां तीमारदारों को डॉक्टर के कहने पर बाहर से दवाएं खरीदने को मजबूर होना पड़ता है। बाहर की दवाई लिखने पर संबंधित डॉक्टर को खासा कमीशन मिलता है। इसका असर पड़ता है तीमारदार की जेब पर।

जिला अस्पताल में बुखार, खांसी-जुकाम, एंटी एलर्जिक समेत सभी दवाएं उपलब्ध हैं। इसके बाद भी बाहर के मेडिकल स्टोर की दवाएं जरूर लिखी जाती हैं। बालरोग, हड्डी, फिजीशियन और सीनियर सिटीजन की ओपीडी में हर दूसरे रोगी को मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने को कहा जाता है। जानकारों के अनुसार डॉक्टरों को 40 प्रतिशत तक कमीशन पहुंचाया जाता है। जानते हुए भी अस्पताल प्रशासन अनजान बना हुआ है। पर्चा एक रुपये का, दवाएं दो सौ तक की

नई आबादी कॉलोनी से बच्चे का इलाज कराने आए नरेश ओझा ने बताया कि अस्पताल में पर्चा तो एक रुपये का बनता है, लेकिन दवाएं खरीदने में दो सौ रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। - वर्जन-

डॉक्टरों को बाहर की दवा लिखने की मनाही है। यदि कोई डॉक्टर बाहर की दवा लिखता है तो मरीज कार्यालय में आकर शिकायत करें।

डॉ. आरके पांडेय, सीएमएस

Posted By: Jagran