जागरण संवाददाता, फतेहपुर : गैर प्रांतों से आए 60 हजार से अधिक प्रवासियों के लिए मनरेगा विकल्प नहीं बन पा रही है। यह जरूर है कि गांव-गांव शुरू हुए मनरेगा के कार्यों से श्रमिकों को काम करने का मौका मिल रहा है। प्रवासियों की स्थिति यह है कि ज्यादातर फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुशल श्रमिक हैं जिन्हें मनरेगा में फावड़ा और तसला लेकर काम करना रास नहीं आ रहा। यही कारण है कि 60 हजार से अधिक प्रवासियों में मात्र 7465 श्रमिकों ने जॉबकार्ड बनवाकर काम करना शुरू किया है।

हर श्रमिक को गांव में काम उपलब्ध कराने के लिए शासन ने मनरेगा के तहत तालाब खोदाई, नाला निर्माण, जलनिकासी, पौधारोपण के लिए गड्ढे तैयार करने, गोशाला में बाउंड्री निर्माण जैसे कार्य शुरू करा दिए। अधिकारियों का मानना है कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले कुशल श्रमिक तेज धूप में फावड़ा नहीं चलाना चाहते। यही कारण है कि सुविधा देने के बाद भी प्रवासी श्रमिक कम संख्या में आ रहे है।

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कुशल श्रमिकों की हो रही पहचान

- जिला पंचायतराज अधिकारी अजय आनंद स्वरूप ने कहा कि बाहर से आए प्रवासियों को रोजगार से जोड़ने के लिए सर्वे कार्य शुरू करा दिया है। दूसरे राज्यों से आए प्रवासियों में कुशल श्रमिक व निर्माण श्रमिकों की पहचान कराई जा रही है। इसके अलावा कितने ऐसे लोग है जो खुद का कारोबार करते थे उनको भी सर्वे में शामिल किया गया है।

54 हजार श्रमिकों को हर रोज मिल रहा काम

- मनरेगा उपायुक्त पुतान सिंह ने कहा कि जब से योजना संचालित हुई तब से अब तक रिकार्ड 54 हजार श्रमिकों को हर रोज काम दिया जा रहा है। पिछले साल अप्रैल व मई माह में 10 से 12 हजार श्रमिकों को ही काम मिल रहा था। उन्होंने कहा कि जिन प्रवासियों के जॉबकार्ड बने उनको घर से बुलाकर काम दिया जा रहा है, जो कुशल श्रमिक है वह मनरेगा में काम करने को तैयार ही नहीं है।

Posted By: Jagran

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