अयोध्या : खिलाड़ियों की नई पौध तैयार करने के उद्देश्य से 2004 से स्कूलों में किया गया। अनिवार्य विषय खेल 15 साल बाद कागजी ही बना हुआ है। कहने को हर साल शासन स्तर से हर छात्र-छात्राओं को कम से कम दो खेलों में प्रतिभाग करने तथा स्कूलों में विद्यालय स्तर पर प्रतियोगिता कराने के आदेश निर्गत किए जाते हैं, लेकिन वे आदेश कितना क्रियान्वित होते हैं। इसी से पता चल रहा है कि स्कूली खेल प्रतियोगिताओं में बमुश्किल आधा दर्जन विद्यालय ही प्रतिभाग करते हैं। यही नहीं, अनिवार्य विषय खेल की हाईस्कूल व इंटर बोर्ड परीक्षाओं को विद्यालय स्तर पर आयोजित कराए जाने का निर्देश भी निर्गत है। विद्यालय परीक्षा कराते हैं या नहीं। यह विद्यालय ही जाने पर अंकों की स्लिप बोर्ड को जरूर भेज दी जाती हैं। छात्रों को मिलने वाला मार्कशीट इसका गवाह है। पंद्रह साल बाद भी अनिवार्य विषय खेल औपचारिकता ही निभा रहा है।

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एक अध्यापक पर बीस क्लास

-अधिकांश विद्यालयों में खेल अध्यापकों का अभाव है। जिन विद्यालयों में नियुक्ति है, वहां कक्षा छह से 12 तक के कक्षाओं के 12 से 20 सेक्शन हैं। विषय को अनिवार्य कर दिया गया पर पढ़ाने के लिए अलग से अध्यापकों की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी गई और न ही संसाधन उपलब्ध कराया गया, जिसके चलते योजना मूर्तरूप नहीं ले पाई। खेल उपकरणों के लिए बजट नहीं

अध्यापकों का कहना है कि विद्यालयों में खेलों के संचालन के लिए अलग से बजट का प्रावधान नहीं किया गया। विद्यालय में लिया जाने वाला शुल्क गिने-चुने खिलाड़ियों भर ही नहीं है, फिर सालभर खेलों के संचालन व पढ़ाई की व्यवस्था तो दूर की कौड़ी है। कक्षा छह से आठ तक शुल्क लिया भी नहीं जाता है। बिना पैसा खेल कराना हास्यापद है।

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जनप्रतिनिधियों ने नहीं दिया ध्यान

अतुल, अमन, विनोद, मनोज, अशोक आदि खिलाड़ियों का कहना है कि विद्यालयों में खेलों की स्थिति से जनप्रतिनिधि अच्छी तरह वाकिब हैं, लेकिन उन्होंने कभी इस समस्या पर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। अहम बात तो यह है कि प्रतियोगिताओं के उद्घाटन व समापन समारोहों में जाने पर खेल खेलने के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं, लेकिन खिलाड़ियों की समस्याओं पर ध्यान नहीं देते हैं।

Posted By: Jagran

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