अयोध्या: चचा मो. शरीफ रामनगरी के लिए ऐसी विभूति हैं, जिन्होंने सेवा की ऐसी राह दिखाई, जो मानवता की मिसाल बन गई। जवान बेटे की मौत और फिर लावारिस की तरह अंतिम संस्कार होना शरीफ चचा की संवेदनाओं को अंदर तक झकझोर गया। अपने इस गम के साथ वे मानवता की सेवा के ऐसे पथ पर चल पड़े, जो न सिर्फ नजीर बनी बल्कि, औरों के लिए प्रेरणा भी और खुद उनके लिए ताउम्र निभाने वाली शपथ। शरीफ चचा की उपलब्धियों पर रामनगरीवासियों को भी गर्व है। करीब 27 वर्ष से शरीफ चचा संकल्प के पथ पर चल रहे हैं। गत नवंबर माह में उन्हें उनके सेवा भाव के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

शरीफ चचा के पुत्र रईस की वर्ष 1993 में सुल्तानपुर जिले में एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। वह दवा लेने सुल्तानपुर गया था। बेटे की खोज में मो. शरीफ कई दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन चचा को बेटे का कोई सुराग नहीं मिला। करीब एक माह बाद सुल्तानपुर से खबर आई कि बेटे की मौत हो गई और लावारिस की तरह अंतिम संस्कार भी कर दिया गया। करीब माह भर बाद उन्हें पुत्र की मौत का समाचार मिल सका था। इसी के बाद शरीफ चचा ने यह संकल्प लिया कि अब अयोध्या की धरती पर किसी भी शव का अंतिम संस्कार लावारिस की तरह नहीं होगा। फिर चाहे वह किसी भी धर्म का हो। शरीफ चचा ने शपथ ली कि वे हर लावारिस शव का अंतिम संस्कार करेंगे और मृतक के धर्म के रीति-रिवाज के अनुसार। कृशकाय हो चुके शरीफ चचा ने 27 वर्षों में हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। खास बात यह है कि अब उन्हीं की राह पर रामनगरी के रितेश दास भी चल रहे हैं। संवेदनाओं से भरे पगे रितेशदास ने भी लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाया है। कोरोना की दूसरी लहर में जब अपने भी साथ छोड़ रहे थे, तो रितेशदास सामने आए, जिन्होंने न सिर्फ कोरोना का शिकार हुए लोगों का अंतिम संस्कार किया, बल्कि दो माह श्मशान घाट पर ही बिताये और घर भी नहीं जा सके।

Edited By: Jagran