अयोध्या : इसे लापरवाही कही जाय या भ्रष्टाचार की जीती जागती मिसाल। परिवहन निगम रिटायरमेंट के दो वर्ष बाद भी परिचालक से ड्यूटी करवाता रहा। मामला संज्ञान में आया तो हड़कंप मच गया। परिचालक को ड्यूटी से वापस बुला लिया गया। आनन-फानन में परिचालक का नाम संविदा सूची से पृथक कर मामले को दबाने की कोशिश की गई। रिकबरी को कौन कहें, आश्चर्य तो इस बात का है कि इस बेहद गंभीर मामले में दोषी अधिकारियों व कर्मियों की जिम्मेदारी तक नहीं तय की जा सकी।

अयोध्या डिपो में परिचालक के पद पर कार्यरत विनय कुमार पांडेय का जन्म 21 जुलाई 1957 को हुआ। वर्ष 2017 में वह 60 वर्ष की आयु पूरी कर चुका। दो वर्ष बाद तक वह पूर्व की भांति परिचालक का कार्य करता रहा। 21 नवंबर को मामला खुला तो अधिकारियों के पैरों तले जमीन खिसक गई। आनन-फानन में परिचालक की तलाश शुरू हुई तो पता चला कि वह बस लेकर कानपुर के लिए रवाना होने जा रहा है। उसे ड्यूटी से वापस बुलवाकर संविदा खत्म होने का लेटर पकड़ाकर विदा कर दिया गया। छानबीन में पता चला कि निगम के पास ऐसा कोई रजिस्टर ही नहीं है, जिसमें संविदा चालकों-परिचालकों की आयु का लेखा-जोखा हो।

इससे पहले दो चालक प्रभाकर सिंह व रामबोध चौहान के साथ भी ऐसा ही हो चुका है। इनसे भी रिटायरमेंट के बाद तक निगम ड्यूटी करवाता रहा। इससे पहले एक मामले में अनुपस्थित वीआइपी वाहन चालक का वेतन रिलीज कर दिया गया था। इस मामले में भी एआरएम फाइनेंस ने गंभीर वित्तीय अनियमितता करार देते हुए अयोध्या डिपो के सहायक प्रबंधक नंदकिशोर चौधरी से स्पष्टीकरण तलब किया था, लेकिन उसमें भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। लापरवाही के ऐसे एक नहीं कई मामले हैं, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत से मामलों को दबा दिया जाता है। एआरएम चौधरी ने पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी है।

Posted By: Jagran

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