अयोध्या : कृष्ण आनंद स्वरूप हैं। कृष्ण के रूप में आनंद ही प्रकट हुआ। अहंकार का सबसे बड़ा शत्रु आनंद है। जहां आनंद और प्रेम है, वहां अहंकार टिक नहीं सकता। प्रेम, सादगी और आनंद के सामने अहंकार स्वत: विसर्जित होने लगता है। यह उद्गार हैं, जगद्गुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेश के। वे रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के निमित्त पूराबाजार क्षेत्र के ग्राम सरायरासी के हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित सात दिवसीय भागवतकथा के चौथे दिन प्रवचन कर रहे थे।

उन्होंने कहा, राममंदिर का ध्वंस उस प्रेम, शील, सदाशयता और सौमनस्यता का ध्वंस था, जिन मूल्यों के पर्याय भगवान राम रहे हैं और रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के साथ इन मूल्यों की पुन‌र्प्रतिष्ठा होगी। उन्होंने कहा, संपूर्ण भारतीय साहित्य इन मूल्यों की प्रतिष्ठा का संवाहक है। जगद्गुरु ने कथा का क्रम आगे बढ़ाते हुए बताया कि जब कृष्ण का जन्म हुआ था, जेल के पहरेदार सो गए थे। पहरेदार वह इंद्रियां हैं, जो अहंकार की पोषक हैं। जब यह इंद्रियां अंतर्मुखी होती हैं, तब हमारे भीतर आंतरिक आनंद का उदय होता है। उन्होंने कहा, कृष्ण का पूरा व्यक्तित्व अहंकार का विसर्जन और आंतरिक आनंद के अभ्युदय का है।

Posted By: Jagran

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