अयोध्या : लॉकडाउन के चलते सवा दो माह तक जहां पूरे देश की धड़कन थमी रही, वहीं पुण्य सलिला सरयू की नित्य आरती की लौ ठंडी नहीं हुई। श्रद्धालुओं का आवागमन पूरी तरह से ठप था। अर्चकों का आवागमन भी मुश्किल था। इसके बावजूद पुण्य सलिला की अर्चना-अभ्यर्थना का संकल्प सिद्ध होता रहा। इसके पीछे पुण्य सलिला के प्रति अगाध आस्था और इस आस्था के लिए कोई भी कीमत चुकाने का संस्कार था। आंजनेय सेवा संस्थान के अध्यक्ष महंत शशिकांतदास ने सात वर्ष पूर्व सहस्त्रधाराघाट पर पुण्य सलिला की नित्य आरती का क्रम शुरू किया था। वह भी दो-चार दीपों से ही नहीं घी के पूरे 1100 दीपों से। शास्त्रीय विधि-विधान। घंटा-घड़ियाल की धुन और आधा दर्जन अर्चकों की पूरी टीम के साथ। आस्था का यह अभियान कम व्ययसाध्य नहीं था, पर धुन के पक्के शशिकांतदास ने हार नहीं मानी और अभियान की गति निर्बाध बनाए रखने के लिए उन्हें पास की जमा-पूंजी लगाने के साथ ऋण भी लेना पड़ा। वक्त के साथ मानों सरयू के रूप में प्रवाहित भगवान विष्णु की करुणा अपने इस अनन्य उपासक पर भी छलकी। कतिपय सहयोगियों के साथ उनकी मुहिम को तत्कालीन जिलाधिकारी विपिन कुमार द्विवेदी का संरक्षण मिला। इसका परिणाम यह हुआ कि माह के 10-15 दिन के लिए उन्हें आरती के प्रायोजक मिलने लगे। तब भी उनके सामने महीने के बाकी बचे दिन की आरती के लिए 50 से 60 हजार रुपये का प्रबंध करनी की चुनौती होती थी और शशिकांतदास इस चुनौती के साथ अपना धर्म निभा रहे थे। प्रतिष्ठित पीठ रामवल्लभाकुंज के अधिकारी राजकुमारदास, नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास एवं इलाकाई विधायक वेदप्रकाश गुप्त ने भी न केवल पुण्य सलिला की नित्य महाआरती के अभियान को संरक्षण दिया बल्कि इस प्रकल्प की ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का ध्यान आकृष्ट कराया। मई 2017 में पहली बार ताजपोशी के बाद रामनगरी पहुंचे मुख्यमंत्री ने पुण्य सलिला के पूजन के साथ नित्य महाआरती को शासकीय सहायता देने का एलान किया। इसके बाद तो इस महानुष्ठान में चार-चांद लग गए। विधायक वेदप्रकाश गुप्त कहते हैं, पुण्य सलिला की महाआरती रामनगरी की आध्यात्मिक धरोहर बनकर सामने आई है और इसके लिए मुख्यमंत्री सहित महंत शशिकांतदास कृतज्ञता के पात्र हैं।

Posted By: Jagran

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस