अयोध्या : यूं तो दीपावली पूरी दुनिया में मनाई जाती है, लेकिन दीपावली अपने केंद्र अयोध्या में गत वर्ष हुए दीपोत्सव से पहली बार पूरी दुनिया के सामने रोशन हुई। इस शुरुआत ने न केवल अयोध्या की सांस्कृतिक धरोहर को नए सिरे से परवान चढ़ाया। दुनिया भर में रामनगरी के सांस्कृतिक सौंदर्य की छटा भी बिखेरी। यह ऐसा मौका भी था, जब अयोध्या विवाद के नाते सुर्खियों में नहीं थी, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत पर झूमती, गाती और इतराती हुई नजर आई थी।

भक्ति, परंपरा, संस्कृति, साहित्य और कवित्व के रंगों से सजे दीपोत्सव ने रामनगरी की सांस्कृतिक धरोहर को शिखर पर पहुंचाया। वनवास से भगवान के अयोध्या आगमन पर रामनगरी में चहुंओर आनंद की ऐसी आभा पहली बार देखने को मिली थी। खास बात यह है कि इस उत्सव में अकेले सनातनी ही नहीं, बल्कि मुस्लिम, सिख, ईसाई व बौद्ध धर्म के लोगों ने सहभागिता की थी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, सिख समाज, मसीही मित्र मंच व बौद्ध समाज के प्रतिनिधि इस उत्सव के गवाह बने थे। हां, अयोध्या की दीपावली को तो गत वर्ष पहली बार भव्यता मिली, लेकिन यहां और भी ऐसे पर्व हैं, जब लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र रामनगरी ही रहती है। अयोध्या के लिए कार्तिक और सावन मास का विशेष महत्व है, तो चैत्र माह भगवान के जन्मोत्सव से गुलजार रहता है। आवश्यकता यह है कि दीपोत्सव की भांति ही इन पर्वों को भी सरकारी स्तर पर भव्यता प्रदान की जाए।

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पूरा कार्तिक माह रहता विशेष

-अयोध्या में कार्तिक मास का विशेष महत्व है। अक्टूबर अथवा नवंबर माह में होने वाली कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को जहां दीपावली का पर्व मनाया जाता है, वहीं शुक्ल पक्ष की नवमी पर होने वाली 14 कोसी व देवोत्थानी एकादशी पर होने वाली पंचकोसी परिक्रमा का आयोजन किया जाता है। इस परिक्रमा में देश भर से श्रद्धालु का अयोध्या आना होता है। इसके साथ ही कार्तिक पूर्णिमा पर सरयू में स्नान करने को देश के कोन-कोने से श्रद्धालु जुटते हैं।

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भोले का सावन भी यहां के लिए है खास

-भोलेनाथ के पूजन का विशेष माह माना जाने वाला सावन अयोध्या में बेहद खास रहता है। जून माह के अंतिम या जुलाई माह के प्रथम पखवारे में अयोध्या में श्रावण माह में भोलेनाथ के पूजन के साथ ही झूलनोत्सव की धूम रहती है। श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया से पूर्णिमा तक चलने वाले झूलनोत्सव में देश भर से श्रद्धालु जुटते हैं। श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को भगवान मंदिरों से निकलकर मणिपर्वत पर झूला झूलने को जाते हैं। इसके बाद मंदिर-मंदिर झूलन की डोर तन जाती है। इन 12 दिनों में कजरी और झूलन के पदों का गायन रामनगरी के करीब-करीब हर मंदिर में सुना जा सकता है।

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रामजन्म और रामविवाह

-मार्च माह के अंतिम अथवा अप्रैल माह के प्रथम पखवारे में होने वाली चैत्र रामनवमी का पर्व भी अयोध्या के लिए बेहद खास रहता है। कनक भवन में होने वाले भगवान के जन्मोत्सव का मुख्य पर्व मनाया जाता है तो दूसरी ओर लगभग सभी मंदिरों में भगवान के जन्म की धूम रहती है। मध्याह्न होने वाले जन्मोत्सव का हिस्सा होने के लिए देश भर से श्रद्धालुओँ का आना होता है। इस उत्सव में शामिल होने के लिए श्रद्धालु माह भर पहले से ही होटलों व धर्मशालाओं में बु¨कग भी करा लेते हैं। वहीं नवंबर के अंतिम अथवा दिसंबर के प्रथम सप्ताह में अगहन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को होने वाला रामविवाहोत्सव भी अयोध्या के लिए गौरवमयी पलों में से एक है। इसी दौरान अयोध्या में रामायण मेले का भी आयोजन किया जाता है।

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अयोध्या के चितेरे बन उभरे योगी

-प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या से लगाव किसी से छिपा नहीं है। वे स्वयं भी कई बार यह कह चुके हैं कि अयोध्या उनके लिए बेहद खास है। सीएम होने से पहले भी मौके-मौके पर अयोध्या आते रहते थे, लेकिन सीएम बनने के बाद उन्होंने रामनगरी के सांस्कृतिक वैभव को शिखर पर पहुंचाने की जो मुहिम शुरू की, उसने उन्हें अयोध्या के चितेरे के तौर पर स्थापित कर दिया। योगी सीएम बनने के बाद पहली बार गत वर्ष 30 मई को न्यास अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास के जन्मोत्सव में आए थे। इसके बाद दूसरी बार 26 जुलाई को मंदिर आंदोलन के पर्याय रहे रामचंद्रदास परमहंस को श्रद्धांजलि देने आए। सीएम बनने के बाद उनका तीसरी बार आगमन रामनगरी की सांस्कृतिक धरोहर के वैभव को शिखर पर पहुंचाने वाला रहा।

By Jagran