अयोध्या : रामजन्मभूमि को लेकर भले ही राष्ट्रव्यापी बहस हो पर उसी से लगते एक अन्य प्रतिष्ठित मंदिर सियापियाकेलिकुंज की अस्मिता लगातार तार-तार हो रही है और इस विडंबना के प्रति उदासीनता का आलम है। करीब दो सौ वर्ष पूर्व इस मंदिर की स्थापना रसिक परंपरा में पगे एक शीर्ष संत ने की थी। आराध्य में लीनता एवं अलमस्ती के कारण वे फकीरेराम के नाम से जाने जाते थे। रामजन्मभूमि के कुछ ही फासले पर उन्होंने पूर्ण मनोयोग से सियापियाकेलिकुंज की स्थापना की और जल्दी ही यह मंदिर रामभक्तों की आस्था के केंद्र के तौर पर प्रतिष्ठित हुआ। मंदिर से न केवल बड़ी संख्या में भक्त जुड़े और समुचित संपदा जुड़ी बल्कि सियापियाकेलिकुंज अपनी उत्सवधर्मिता के लिए भी सुविख्यात हुआ। हालांकि 1985 में मंदिर के तत्कालीन महंत राजदुलारीशरण के साकेतवास के साथ ही मंदिर की वैभवयात्रा पर बट्टा लगा पर मंदिर की अस्मिता पर ग्रहण जनवरी 1993 में रामजन्मभूमि के इर्द-गिर्द 67.77 एकड़ भूमि अधिग्रहण के साथ लगा। यद्यपि सियापियाकेलिकुंज अधिग्रहण की परिधि से बाहर था पर सुरक्षा संबंधी बंदिशों के चलते मंदिर को तकरीबन वे सारे दंश झेलने पड़ रहे हैं, जो अधिग्रहण में शामिल मंदिरों को झेलने पड़े। मंदिर देखते-देखते अधिग्रहीत परिसर की सुरक्षा में तैनात सीआरपीएफ के जवानों की आश्रय स्थली बन गया और दर्शनार्थियों से लेकर मंदिर में रहने वाले संतों के आवागमन पर सुरक्षा व्यवस्था का हवाला कदम-कदम पर बाधा खड़ी की गई। ऐसी बंदिशों से मंदिर के तत्कालीन महंत युगलकिशोरशरण अवसादग्रस्त होकर अपने कक्ष तक सिमट कर रह गए। जबकि मंदिर परिसर के अधिकांश हिस्से में सीआरपीएफ के शिविर सज गए। मंदिर की ओर संत समाज का ध्यान इसी वर्ष के पूर्वा‌र्द्ध में गया, जब महंत युगलकिशोरशरण का गुमनामी के बीच साकेतवास हो गया। इसके बाद संतों ने राजदुलारीशरण के शिष्य रघुवरशरण को महंत बनाया। इस उम्मीद के साथ कि वे मंदिर की प्रतिष्ठा से न्याय करेंगे। नवनियुक्त महंत ने अपने तई प्रयास भी शुरू किया है पर सबसे बड़ी अड़चन यह है कि मंदिर सीआरपीएफ से मुक्त हो और मंदिर में श्रद्धालुओं एवं संतों के आवागमन पर लगी बंदिश दूर हो।

Posted By: Jagran