अयोध्या (रघुवरशरण): रामनगरी श्रीराम के साथ राम नाम की भी अनन्य अनुरागी है। नगरी की शीर्ष पीठ मणिरामदास जी की छावनी सेवा ट्रस्ट की ओर से संचालित सीताराम नाम बैंक में खरबों बार राम नाम लेखन से युक्त कापियां जमा हैं, तो प्राचीन कालेराम मंदिर में राम नाम मंदिर के रूप में एक स्वतंत्र उप मंदिर है। यहां 15 करोड़ राम नाम लेखन एक बड़े संदूक में चिन्मय-चैतन्य विग्रह के रूप में संरक्षित है। इसकी उसी भाव और विधान से पूजा होती है, जिस तरह मां सीता एवं श्रीराम के विग्रह की पूजा होती है। नामोपासना के इन केंद्रों के अलावा राम नाम में अनुराग रामनगरी के आध्यात्मिक-सांस्कृतिक संस्कारों में समाहित है। कोई भी विशेष मौका-मन्नत हो रामधुन अति पवित्र अनुष्ठान के रूप में संयोजित होती है। यह श्रद्धालुओं की सुविधानुसार कुछ घंटों से लेकर 24 घंटे, पूरे माह और पूरे वर्ष अखंड चलती है। रामनगरी में कुछ स्थल ऐसे हैं, जहां पीढि़यों से रामधुन चल रही है। मणिरामदास जी की छावनी में पांच दशक से अहर्निश रामधुन गूंज रही है। 24 घंटे के बीच छह पालियों में तीन से चार संत-श्रद्धालु अखंड राम धुन का क्रम आगे बढ़ाने के लिए नियुक्त हैं। जानकीमहल में भी अखंड रामधुन गूंजती रहती है। यहां अखंड रामधुन 1983 से ही चल रही है। राम नाम की साधना के अति प्रतिष्ठित केंद्र की तरह स्थापित सरयू तट स्थित फटिकशिला में भी चार दशक से अखंड रामधुन गूंज रही है। राम नाम के प्रति अनन्य अनुराग आचार्य पीठ दशरथमहल बड़ास्थान से भी परिभाषित होता है। बिदुगाद्याचार्य देवेंद्रप्रसादाचार्य 1997 में इस पीठ के आचार्य नियुक्त गए और तभी से दशरथमहल भी अखंड रामधुन के प्रवाह से अभिषिक्त होने लगा।

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शास्त्रों में नाम महिमा का प्रचुर विवेचन

- मणिरामदास जी की छावनी के ट्रस्टी एवं प्रख्यात कथाव्यास पं. राधेश्याम शास्त्री के अनुसार रामकथा से जुड़े काव्यों के अलावा अनेक वैदिक ग्रंथों में राम नाम की महिमा का प्रचुर विवेचन है ही और साधारण ²ष्टि से यह महत्ता उन स्थानों से पुष्ट है, जहां अखंड राम नाम संचालित है। वे याद दिलाते हैं कि छावनी की प्रतिष्ठा शीर्ष पर ले जाने में गुरुदेव महंत नृत्यगोपालदास के आध्यात्मिक प्रताप के अलावा अखंड रामधुन की अहम भूमिका रही है। -------------------

प्रभु ने करुणावश दिया नाम का अवलंब

- नामोपासना के शीर्ष केंद्र फटिकशिला के महंत डॉ. शुकदेवदास के अनुसार जीव ईश्वर का अंश है और ईश्वर की प्रतीति-प्राप्ति उसकी चिर साध है। पूर्व के दौर में यह साध साकार करने के लिए लोग कठिन से कठिन साधना करने में सक्षम थे, पर कलयुग के प्रभाव से जब मनुष्य कठिन साधना करने में सक्षम नहीं रह गया है, तब प्रभु ने अपनी करुणावश नाम का अवलंब प्रदान किया है। इसका प्रयोग करें, परिणाम स्वत: सामने आएगा। वे अपने गुरु साकेतवासी बगही बाबा का उदाहरण देते हैं। मान्यता है कि नाम जप के प्रभाव से उनमें अनेक सिद्धियां आ गई थीं।

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नामोपासना के दिग्गज आचार्य थे बाबा

- नामोपासना का जिक्र बगही बाबा के उपनाम से विख्यात तपस्वी नारायणदास के बिना अधूरा है। बिहार के बगही नामक स्थान पर बेहद साधारण परिवार में जन्मे नारायणदास का जीवन राम नाम के चमत्कार का परिचायक है। चुनौती चाहे जैसी भी हो उनकी श्वांस-प्रश्वांस बिना डिगे राम नाम में ढलती गई और इस साधना के साथ उनका आध्यात्मिक प्रताप विस्तीर्ण होता गया। राम नाम में अनुराग प्रगाढ़ होने के साथ वे 1978 में आराध्य की नगरी अयोध्या आ पहुंचे। यहां भी उनके नामानुराग का डंका बजा। उनकी छवि अनेक विशाल यज्ञ एवं विशाल भंडारा करने के साथ भक्तों पर कृपा करने वाले करिश्माई संत की बनी। 2002 में उन्होंने अपनी इहलीला का संवरण किया, कितु अखंड रामधुन, नामोपासना और सेवा केंद्र के रूप में उन्होंने जिस आध्यात्मिक प्रतिष्ठान की स्थापना की, वह निरंतर उन्नत होता जा रहा है।

Edited By: Jagran