अयोध्या [नवनीत श्रीवास्तव]। एक ओर जहां रामजन्मभूमि के पाश्र्व में प्रवाहित उत्तरावाहिनी मां सरयू, आग्नेय कोण पर विराजमान हनुमानजी, अयोध्यावासी और श्रद्धावनत साधक अब जल्द अपने रामलला को भव्य भवन में विराजमान होते देखेंगे, तो दूसरी ओर मंदिर के शिलान्यास में देश की सभी पवित्र नदियों व समुद्र का जल लाने की योजना भी बन रही है, लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि रामनगरी अयोध्या में ही 27 तीर्थों का जल है। सप्तपुरियों में अग्रणी अयोध्या के निकट ही भरत की तपोभूमि भरतकुंड है। 

माना जाता है भगवान राम के वनवास के दौरान भरतजी ने राज सिंहहासन पर उनकी चरण पादुका रख कर यहीं 14 वर्ष तक तप किया था। न जाने कितने वर्ष बीत गए, लेकिन भरत के तप का तेज इस भूमि पर अब भी महसूस किया जा सकता है। यहीं वह कूप है, जिसमें 27 तीर्थों का जल है। खास बात यह है कि भरत कूप आज भी जस का तस विद्यमान है और इसमें पानी भी है, जिसे भरतकुंड आने वाले श्रद्धालु श्रद्धावनत भाव से शिरोधार्य करते हैं। 

ऐसी मान्यता है कि वनवास के बाद जब भरतजी भगवान राम को मनाने के लिए चित्रकूट गए थे, तो अपने साथ 27 तीर्थों का जल भी लेकर गए थे। जब भरतजी भगवान की चरण पादुका लेकर वापस आने लगे तो 27 तीर्थों का आधा जल चित्रकूट के एक कूप में स्थापित किया और आधा भरतकुंड स्थित कूप में। त्रेताकाल से लेकर अब तक नंदीग्राम में यह कूप विद्यमान है। इसी स्थान पर भगवान राम व हनुमानजी से भरत के मिलाप का मंदिर भी है। साथ ही भरत तपस्थली भी। भरतकुंड स्थित रामजानकी मंदिर के व्यवस्थापक रामभूषणदास कृपालु बताते हैं कि भरत जी इसी जल से पूजन व जलपान करते थे। नंदीग्राम आने वाले श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से इस कूप के जल का सेवन करते हैं। 

कभी था सात सागरों का जल

अयोध्या में ही सात सागरों का जल भी है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम जब वनवास से लौटे तो उनके राज्याभिषेक के लिए सात सागरों का जल भी लाया गया था। छोटी देवकाली के पाश्र्व में एक कुंड में सात सागरों के जल को स्थापित किया गया था, हालांकि अब इस सप्तसागर कुंड का वजूद लगभग समाप्त है। 

 

Posted By: Divyansh Rastogi

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