ओम प्रकाश बाथम, इटावा

यह जिदगी की गाड़ी है, लॉकडाउन में गांव में आना मजबूरी थी लेकिन हमारी कर्मस्थली तो शहर ही है, बगैर इसके काम नहीं चलेगा। लॉकडाउन के सहारे परिवार के सभी सदस्यों से मिलना-जुलना हो गया। अब जब शहर के कारखानों में काम शुरू होगा तो हम वापस चले जाएंगे। परिवार के साथ कुछ दिन रहने का सुख भी मिलना चाहिए और अपनों से मेल-मुलाकात भी जरूरी है। लंबे समय से जो शहर में हमने अपना सेटअप बनाया था उससे निकलना मुश्किल होगा। अभी हाल-फिलहाल गांव में उद्योग व्यापार का कोई नया रास्ता भी तो नहीं दिखाई देता। इस लिए शहर में जाना ही सबसे अच्छा कदम होगा। यह कहना है कि शहर की सीमा से जुड़े ग्राम बुलाकीपुर लुहन्ना में लौटे प्रवासियों का, जो बीते दिनों कुछ दिन पूर्व अलग-अलग शहरों से अपने गांव वापस आए थे। लॉकडाउन के दौरान बिताए गए दिनों की याद आते ही रूह कांप उठती है। पांच किलो आटा में पूरे महीने पेट भरना कभी नही भूलेगा। इससे पहले दिल्ली में अगरबत्ती बेंचकर अच्छा कमीशन मिल जाता था, लेकिन लॉकडाउन लगते ही काम बंद हो गया। जैसे-तैसे साइकिल से घर वापसी हुई। प्रधान जी की कृपा से मनरेगा में काम मिल गया। बच्चों को दाल रोटी का जुगाड़ तो हो ही जाता है। अब कंपनी अगर बुलाती है तो हम जाएंगे।

कैलाश बाबू दिल्ली में रहकर इलेक्ट्रिशियन का काम करता था, अच्छी इनकम हो जाती थी लेकिन लॉकडाउन लगते ही भूखों मरने की नौबत आ गई। मजबूरी में दिल्ली छोड़कर गांव आना पड़ा। जमापूंजी खत्म हो जाने से जो सम्मान घर में मिलना चाहिए था नहीं मिला। बच्चों की भूख मिटाने के लिए प्रधान पति राजवीर सिंह राजपूत से संपर्क किया और मदद मांगी, उन्होंने मनरेगा के तहत काम दे दिया। किसी तरह से बच्चों को दो जून की रोटी की व्यवस्था कर रहा हूं। अब अगर कंपनी बुलाती है तो वह चले जाएंगे।

प्रदीप कुमार दिल्ली में रहकर पॉलीथिन के कारखाने में काम करता था, अच्छी कमाई हो रही थी। लॉकडाउन लगते ही काम बंद हो गया। जो जमापूंजी थी खत्म हो गई। कंपनी अब दोबारा बुला रही है। कुछ दिन परिवार के साथ रह लूं उसके बाद चला जाउंगा। आखिर रुपये तो कमाने ही हैं।

अजय कुमार मुम्बई में रहकर फूल डेकोरेशन का कार्य करके परिवार का भरण-पोषण कर रहा था। अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी। लॉकडाउन में सब कुछ बंद हो जाने के कारण अपने गांव आ गया। अब जैसे ही कार्य फिर से शुरू होगा वापस जाने की सोचूंगा। अभी कुछ दिन परिवार के साथ रह लूं। आखिर जाना तो शहर में ही है। रोजी रोटी तो वहीं पर है।

सर्वेश राजपूत

Posted By: Jagran

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