मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

जागरण संवाददाता, एटा: सरकारी अस्पतालों में दवा खरीदने पर रोक लगा दी गई है। अब सीधे दवा की आपूर्ति भेजी जाएगी, जिसके लिए लखनऊ में स्टोर बनाया जा रहा है। लेकिन समस्या यह है कि इस प्रक्रिया में एक से दो महीने का समय लगने की संभावना है। जबकि जिला अस्पताल में दवाओं का पहले से टोटा है। ऐसे में बिन दवाओं के अस्पताल में लोगों को कोई राहत मिलना मुश्किल होगी।

अभी तक सीएमओ और जिला अस्पताल को रेट कांट्रेक्ट के आधार पर दवाएं, उपकरण आदि खरीदने के लिए बजट भेजा जाता था, लेकिन अब शासन ने उप्र मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन की स्थापना कर दी है। जिसके तहत लखनऊ में ही उपकरण-दवाएं खरीदी जाएंगी। जबकि मांग के अनुरूप उनकी सप्लाई जिलों को दी जाएगी। जिलों को बजट नहीं दिया जाएगा। इसे लेकर शासन ने साफ निर्देश भेज दिए हैं, जिसमें दवा खरीद को बंद कर दिया है। अभी तक अस्पताल स्थानीय स्तर पर जरूरी दवाओं की खरीद कर लेते थे। इस पर रोक लगा दी गई है। भ्रष्टाचार के खात्मे को लागू की जा रही नई व्यवस्था फिलहाल मरीजों पर बहुत भारी पड़ने वाली है। क्योंकि नई व्यवस्था लागू होने के बाद दवाएं जून से पहले आने की संभावना कम हैं। जबकि अस्पतालों में दवाओं का स्टॉक इतना नहीं कि दो महीने दवाएं चल सकें। पूर्व में दवा कंपनियों को समय से भुगतान न किए जाने के कारण उनका 40 लाख रुपया अस्पताल पर उधार हो गया और कंपनियों ने दवा भेजना बंद कर दी। इस वित्त वर्ष में अधिकारी बजट मांगते रहे, जबकि शासन से लेटलतीफी होती रही। वित्त वर्ष के अंतिम महीनों में 40 लाख रुपये दिए गए। जबकि मांग 80 लाख रुपये की थी। ऐसे में कामचलाऊ व्यवस्था हो पाई और वित्त वर्ष समाप्त हो गया। अब बजट मिलने की उम्मीद भी नहीं है। दवाएं जल्दी नहीं आती हैं तो अस्पताल के हालात बद से बदतर हो सकते हैं। पीसीएम, आयरन से हर मर्ज का इलाज

-----------

जिला अस्पताल में तमाम महत्वपूर्ण दवाएं नहीं हैं। दर्द निवारक इंजेक्शन, गोलियां, ट्यूब के अलावा कैल्सियम, अल्बंडाजोल, कई तरह की एंटी बायटिक दवाएं नहीं हैं। अधिकांश मरीजों को पीसीएम ओर आयरन की गोलियां थमाई जा रही हैं। जानकारी के अभाव में डॉक्टर अन्य दवाएं लिख भी दें तो वो दवा वितरण काउंटर पर मिलती नहीं है। 13 अप्रैल तक मांगा वार्षिक मांग पत्र

-----------

पहले जहां दवाएं खत्म होने पर उन्हें मंगाने के लिए संबंधित दवा कंपनियों को इंडेंट किए जाते थे। वहीं, अब इस व्यवस्था को बदल दिया गया है। नई प्रक्रिया में जिला अस्पताल, जिला महिला अस्पताल और सीएमओ पूरे साल में होने वाले दवाओं के खर्च का ब्यौरा बनाकर मांग भेजेंगे। इसके लिए शासन ने 13 अप्रैल तक मांग पत्र मांगा है। यहां सीएचसी-पीएचसी के लिए सीएमओ और जिला अस्पताल के लिए सीएमएस की अध्यक्षता में समिति बनाई गई है। जिला अस्पताल में शनिवार को इस समिति की बैठक हुई। जिसमें शामिल सभी डॉक्टर्स, फार्मासिस्ट ने जरूरी दवाओं पर चर्चा की। अब वार्षिक मांग पत्र बनवाना शुरू कर दिया है। अधिकारियों की बात

-------------

उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन का गठन प्रदेश स्तर पर कर दिया गया है। लोकल स्तर पर दवाएं खरीदे जाने पर रोक लगा दी गई है। शासन स्तर से ही दवाएं भेजी जाएंगी। इसके लिए वार्षिक मांग पत्र तैयार कराया जा रहा है। तब तक के लिए दवाओं का स्टॉक है।

- डॉ. अजय अग्रवाल, सीएमओ

-------------

पिछले वित्त वर्ष में मांग के अनुरूप बजट न मिलने से समस्या हुई। साथ ही आपूर्तिकर्ता दवा कंपनियों पर बिल भुगतान भी बकाया था,, जिससे दवाओं की आपूर्ति कम आ सकी। अब दवाएं शासन स्तर से ही भेजी जाएंगी। आपूर्ति बंद कर दी गई है। वैकल्पिक व्यवस्था के कोई निर्देश नहीं हैं।

- डॉ. एसके मजूमदार, सीएमएस जिला अस्पताल

Posted By: Jagran

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप