जागरण संवाददाता, एटा : पुलिस ने शादी समारोह में बजने वाले डीजे पर भले ही कार्रवाई कर दी हो, लेकिन यह कार्रवाई सिर्फ कोरम तक ही सीमित है। अभी अगर इस तथ्य को लेकर माथापच्ची शुरू हो जाए कि डीजे से आने वाली आवाज से कितना ध्वनि प्रदूषण हो रहा था तो इसे मापने के लिए उपकरण तक नहीं हैं। शासन की तरफ से यह निर्देश हैं कि किसी भी सूरत में ध्वनि प्रदूषण न होने दिया जाए। इसके लिए लंबी-चौड़ी गाइड लाइन भी दे दी गई है, लेकिन सुविधाएं मुहैया नहीं कराईं गईं, ताकि ऐसे तत्वों पर प्रभावी कार्रवाई हो सके जो वाकई ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा दे रहे हैं।

ध्वनि प्रदूषण मापने के लिए साउंड मीटर तक पुलिस को उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। इसलिए पुलिस सिर्फ जुर्माना वसूलकर कार्रवाई का कोरम पूरा कर देती है। अगर कोर्ट में साबित करने की बात आए तो तथ्यात्मक तरीके से यह साबित नहीं किया जा सकता कि जिस पर कार्रवाई की है उसने कितना ध्वनि प्रदूषण फैलाया। वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक गाइड लाइन दी थी कि वाहनों में बजने वाले प्रेशर हॉर्न पूरी तरह से बंद करा दिए जाएं, लेकिन आज तक यह हॉर्न बंद नहीं हैं। सड़कों पर कहीं भी इन्हें बजते हुए देखा जा सकता है।

इसके अलावा यह निर्देश भी थे कि शहर में स्कूली क्षेत्र वाले इलाकों को साइलेंस जोन घोषित किया जाए, लेकिन इसकी भी घोषणा यहां आज तक नहीं की गई। स्कूलों के पास से भी वाहन प्रेशर हॉर्न बजाते हुए गुजर जाते हैं। वर्ष 2018 में ट्रैफिक पुलिस ने 108 चालान ऐसे वाहनों के किए जो ध्वनि प्रदूषण फैला रहे हैं। अनुमान से ही ध्वनि की माप लिख दी गई। उपकरण खरीदने के लिए ट्रैफिक पुलिस के पास कोई बजट नहीं है, सिर्फ शासन की रहमत का इंतजार है। टीएसआई बचान ¨सह शाक्य ने बताया कि ध्वनि प्रदूषण मापने के लिए अच्छे उपकरणों की आवश्यकता है ताकि और ढंग से प्रभावी कार्रवाई की जा सके। रिहायशी इलाकों में सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक 55 डेसिबल से ज्यादा शोर नहीं होना चाहिए।

Posted By: Jagran

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