जागरण संवाददाता, एटा: जलेसर कस्बा और क्षेत्र में डग्गेमार बेखौफ हैं। रोडवेज बसों की कमी का फायदा ट्रांसपोर्टर जमकर उठा रहे हैं। बस हो या अन्य सवारी वाहन, डग्गेमारी और ओवरलो¨डग के जरिए लोगों की जान जोखिम में डाली जा रही है।

जिले को परिवहन सुविधाओं से उपेक्षित रखा गया है। रोडवेज बसें गिनी-चुनी हैं, जबकि सैकड़ों की संख्या में लोग विभिन्न शहरों के लिए आवागमन करते हैं। मजबूरी में लोग अन्य वाहनों को तलाशते हैं। यात्रियों की भीड़ और सरकारी परिवहन सेवाओं की बदइंतजामी को देखते हुए यहां निजी परिवहन सेवा का नेटवर्क काफी बड़ा बना लिया गया है। जिला मुख्यालय से यहां तक अधिकारी भी सहज नहीं आते, इसलिए डग्गेमारी बेखौफ हो गई है। एक-एक रूट पर चार-पांच बसों के परमिट हैं। जबकि उन पर दर्जन भर बसें दौड़ाई जा रही हैं। आगरा, सादाबाद, फीरोजाबाद, सिकंदराराऊ, अवागढ़, निधौली कलां, हाथरस जंक्शन मार्गों पर दौड़ती बसों में अंदर से लेकर छत तक पर सवारियां लदी नजर आती हैं। शाम चार बजे के बाद सफर बंद

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शाम चार बजे के बाद यहां से सफर भी बंद हो जाता है। निजी बसें इसी समय तक रवाना होती हैं। ऐसे में अगर किसी को शाम के बाद कहीं जाना है तो मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। टेंपो या अन्य डग्गेमार वाहन उन्हें ले चलने के लिए तैयार तो हो जाते हैं, लेकिन उनका सफर करने में लोग खतरा महसूस करते हैं।

डेढ़ साल से नहीं हुई चे¨कग

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परिवहन विभाग की मुस्तैदी का आकलन इसी बात से किया जा सकता है कि डेढ़ साल से यहां वाहनों की चे¨कग तक नहीं हुई है। जनवरी 2017 में अलीगंज में हुए सड़क हादसे के बाद शासन की सख्ती पर जिले भर में प्राइवेट और डग्गेमार वाहनों पर शिकंजा कसा गया था। उस समय सहायक संभागीय परिवहन अधिकारी ने आकर वाहनों की चे¨कग आदि भी की। हालांकि, कोई कड़ी कार्रवाई उस समय भी नहीं हुई थी। लोगों का कहना

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यदि परमिट वाहन हों और क्षमता के अनुरूप यात्री बैठाए जाएं, तो उनमें सफर करने में कोई समस्या न हो। लेकिन ऐसा होता नहीं है।

- आयुष पचौरी

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कई बार प्राइवेट वाहन चालकों की लापरवाही से हादसे हो चुके हैं। लेकिन डग्गेमारी और ओवरलो¨डग पर शिकंजा नहीं कसा जाता है।

- देवेंद्र

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कभी-कभी अधिकारी आते भी हैं, लेकिन कार्रवाई कम और औपचारिकता अधिक निभाई जाती है। जिसके चलते डग्गेमारी रुकना असंभव हो गया है।

- संजीव वर्मा

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रोडवेज बसों की कमी यहां के लोगों के लिए बड़ी समस्या है, जिसके चलते सफर के लिए न चाहते हुए भी डग्गेमार वाहनों की शरण लेनी पड़ती है।

- गिरीश वाष्र्णेय

Posted By: Jagran

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