जागरण संवाददाता, एटा: समय का बदलाव संस्कृत और संस्कृति पर प्रहार कर रहा है। पाश्चात्य संस्कृति की बयार में बदलती लोगों की सोच ने वेद पुराणों की भाषा संस्कृत के स्वरों को कमजोर कर दिया है। एटा जिले में दो दशक पहले तक आधा दर्जन से ज्यादा संस्कृत विद्यालय मौजूद थे। यहां दूरदराज के विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। जब लोगों का आकर्षण संस्कृत छोड़ अंग्रेजी की ओर बढ़ा तो संस्कृत विद्यालय बंद होते गए। इन हालातों में मुख्यालय स्थित आर्ष गुरुकुल आजादी के बाद से आज भी संस्कृत के प्रचार-प्रसार के साथ गुरुकुल परंपरा के निर्वहन और भारतीय संस्कृति को अक्षुण बनाए रखने के प्रयासों में जुटा है। खास बात तो यह है कि इस गुरुकुल में संस्कृत पढ़ने वाले कितने ही लोग संस्कृत के क्षेत्र में देश-विदेश तक जिले की भूमि को गौरवान्वित कर रहे हैं। गुरुकुल में सीखे गए मंत्र और ऋचाओं के जरिए वह संस्कृत की अलख जगा रहे हैं।

एटा-कासगंज रोड पर शहर से एक किमी दूर वर्ष 1948 में आजादी के बाद ही स्वामी ब्रह्मानंद दंडी ने आर्ष गुरुकुल की स्थापना की थी। इस संस्थान के जरिए उनका उद्देश्य गुरुकुल परंपरा को जारी रखते हुए संस्कृत के प्रचार-प्रसार और देववाणी के विद्वानों के जरिए भारतीय संस्कृति के मूल्यों की रक्षा करना था। उस समय जनमानस में संस्कृत के प्रति खासा आकर्षक था। लोग अपने बच्चों को संस्कृत विद्वान बनाने के लिए उत्साहित नजर आते थे। इसी वजह से गुरुकुल में हर साल 500 से भी ज्यादा बच्चे गुरुकुल परंपराओं और आचरणों से जुड़ जाते। यही धीरे-धीरे संस्कृत शिक्षा, कर्मकांडों के ज्ञाता होकर यहां से विद्वान बनकर ही निकलते। धीरे-धीरे समय गुजरता गया और आर्ष गुरुकुल की ख्याति यहां से पढ़ लिखकर निकले विद्वानों की ख्याति से बढ़ती गई।

वर्ष 1964 में गुरुकुल संस्थापक का निधन हुआ तो इसी संस्था में पढ़े आचार्य देवराज शास्त्री को गुरुकुल के उद्देश्यों की पूर्ति की जिम्मेदारी मिल गई। लगातार उसी क्रम से गुरुकुल संस्कृत के विद्वानों को तैयार करने की संस्था बनी हुई है। हालांकि 21वीं सदी की शुरुआत होने के साथ अंग्रेजी के बढ़ते प्रचलन के मध्य यहां तक बच्चों को लाने में कुछ समस्याएं जरूर हुईं, लेकिन गुरुकुल शिष्यों से महकता रहा और यहां हर रोज यज्ञ शाला में मंत्रों की गूंज और संस्कृत ज्ञान की पाठशाला आज भी अपने उद्देश्यों की पूर्ति कर रही है। अब तो दूसरे जिलों से भी बच्चे यहां शिक्षा पाने के लिए आते हैं। संस्कृति और संस्कृति की गतिविधियों को जीवंत रखने के साथ ही आर्ष गुरुकुल अब भी विदेशों तक अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आचार्य बागीश, भारतेंद्रु जैसे मुख्य विद्धान

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अब तक आर्ष गुरुकुल में शिक्षित कितने ही विद्वान बनकर देश विदेशों में संस्कृत का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं। इनमें आचार्य बागीश जहां भारत के अलावा अमेरिका, इंगलैंड आदि देशों तक भारतीय संस्कृति का परचम लहरा चुके हैं। वहीं बीबीसी लंदन में ¨हदू, संस्कृत के समाचार संपादक रहे भारतेंद्रु विमल ने भी इस संस्थान को गौरवान्वित किया। इसके अलावा यहां शिक्षित हजारों प्रतिभाएं विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, स्कूलों के अलावा भारतीय सेना, संस्कृत केंद्रों सहित विभिन्न संस्थानों में संस्कृत की अलख जगा रहीं हैं। शिक्षा के साथ संस्कारों का भी केंद्र

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गुरुकुल सिर्फ संस्कृत शिक्षा या वेद पुराणों के पठन-पाठन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां विद्यार्थी के रूप में आने वाले किशोरों को संस्कारित जीवन जीने की कला भी सीखने को मिल रही है। यहां अनुशासन और संस्कारों का मूल्यांकन भी प्राथमिकता पर रहता है। यही वजह है कि आज भी लोग अपने बच्चों को यहां तक संस्कारिक जीवन निर्माण के लिए भेज रहे हैं। अब भी हर साल 200 से 250 तक विद्यार्थी बने रहते हैं। आगे भी जीवंत रखेंगे मिशन

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आर्ष गुरुकुल के अधिष्ठाता आचार्य देवराज शास्त्री कहते हैं कि भले ही समय बदले या लोगों के मन, संस्थान संस्कृत के प्रचार प्रसार के साथ संस्कारित शिक्षा के अपने उद्देश्यों को पूरा करता रहेगा।

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