चित्रकूट [शिवा अवस्थी]। तिरस्कार का सबसे बेहतर जवाब क्या है? लड़ाई-झगड़ा तो कतई नहीं। इसका जवाब जानना है तो चित्रकूट, उप्र के जगद्गुरुरामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय आइए। यहां ऐसे व्यक्तित्व से आपका साक्षात्कार होगा, जिसने सेरेब्रल पाल्सी (मस्तिष्क पक्षाघात) का शिकार होने के बाद भी आत्मबल को नहीं मरने दिया। अपनों से भी तिरस्कृत हुए, किंतु हार नहीं मानी।

विवि में हिंदी प्रवक्ता पद पर कार्यरत 38 वर्षीय पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू' ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे चार किताबें लिख दीं। उनके 20 संयुक्तकाव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं। कहते हैं, मैंने उस तिरस्कार के दंश को समेटा और अपनी जीवटता से सफलता का पीयूष (अमृत) पाकर तिरस्कार और असफलताओं को हरा दिया। पीयूष ने कहा, शरीर कमजोर हो सकता है, मन नहीं। मन, बुद्धि, मेधा और आत्मबल प्रबल हो तो हर कमजोरी को हराया जा सकता है...। आज विश्व दिव्यांग दिवस है और पीयूष का यह प्रेरक कथन उन लोगों के लिए निश्चित ही प्रेरणा का काम करेगा, जो आत्मबल के बूते कमजोरियों को हरा रहे हैं।

शरीर में लगातार कंपन और व्हीलचेयर पर दिन बिताने वाले पूतू को उनके कृतित्व के लिए देश-विदेश से अनेक सम्मान मिले हैं। इस बार भी विश्व दिव्यांग दिवस पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजधानी लखनऊ में उन्हें 'सृजनशील दिव्यांग व्यक्ति पुरस्कार' से सम्मानित करेंगे।

सेरेब्रल पाल्सी का जिक्र आते ही प्रसिद्ध ब्रह्मंड विज्ञानी स्व. स्टीफन हाकिंग का नाम उभर आता है। प्रो. हाकिंग ने व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे भी अपने अथाह आत्मबल, अथक प्रयास और मेधा के बूते विश्व को नतमस्तक कर दिखाया। पीयूष कहते हैं कि स्टीफन हाकिंग से उन्हें भी प्रेरणा मिली। पीयूष अब जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य की प्रेरणा और निर्देशन में 'हिंदी साहित्य में दिव्यांग विमर्श' विषय पर शोध (पीएचडी) कर रहे हैं।

मूल रूप से फतेहपुर, उप्र के ग्राम टीसी, हसवा निवासी पीयूष कहते हैं, पैदा हुआ तो अपाहिज बेटा पैदा करने के कारण मां लल्ली देवी को ताने सहने पड़े। मामा वामदेव ने मां-बेटे को घर पर आसरा दिया। मां ने दो बहनों के लालन-पालन किया और मन की ताकत विकसित करने का सहज प्रशिक्षण दिया। न हाथ उठता न शरीर, क्या करता, तब बोल कर लिखवाने की प्रेरणा मिली। इसी ताकत ने इंटर तक की पढ़ाई सामान्य बच्चों के बीच (नागा निरंकारी इंटर कॉलेज) से पूरी कराई। वर्ष 2008 में जगद्गुरुस्वामी रामभद्राचार्य जी महाराज के सान्निध्य में आया तो लेखन को आयाम मिला। रेडियो, टीवी पर काव्य गोष्ठियों, वरिष्ठ हिंदी साहित्यकारों को पढ़कर सीखा और कुछ स्वयं के प्रयास से। सहयोगियों ने सहयोग किया तो बोलकर लिखवाता गया। इस तरह यहां तक पहुंचा हूं...।

पीयूष ने पांच बार नेट परीक्षा दी और हर बार पास किया। कहते हैं, नई जानकारी से कितना अपडेट हूं, यह जानने के लिए परीक्षा देता था। जेआरएफ प्राप्त कर शोध शुरू किया। इससे पहले इसी विवि में टॉपर छात्र के रूप में 2013 में स्वर्ण पदक पाया। 2014 में प्रवक्ता बना।

छायावादोत्तर रत्न, छायावादोत्तर काव्य कलश, भक्तिकाव्य-पीयूष और रीति कालीन काव्य, यह पीयूष द्वारा लिखी गई पुस्तकें हैैं। उनके प्रमुख संयुक्तकाव्य संग्रह अंर्तमन, समकालीन दोहा कोश, किरनां दा कबीला, किरन-किरन रौशनी (पंजाबी), सहोदरी सोपान, कविता अनवरत, यशधारा, प्रभातम, संकल्प से सिद्धि तक, आधुनिक दोहा, विश्व छंद कोष, फतेहपुर के हाइकुकार आदि में सौ से अधिक कविताओं का प्रकाशन हो चुका है। वर्ष 2016 में उन्हें शब्दयात्री आत्मबली सम्मान, 2017 में अंतरराष्ट्रीय सहयोग सम्मान (कनाडा), 2019 में शब्द सारथी सम्मान और काव्यांजन गौरव अलंकरण सम्मान प्रदान किया गया। पीयूष कहते हैैं, यह तो शुरुआत है...।

आप भी अपना लक्ष्य पा सकते हैं...

जीवन को भार नहीं समझें। जो नहीं कर सकते हैं, उसमें न उलझे, जो कर सकते हैं उसमें कुछ नया करने की सोचें। नकारात्मक दृष्टिकोण वालों से दूर रहें। सकारात्मक माहौल में कमजोरियों को ताकत बनाएं। आत्मबल को पहचानें, जिसके बूते आप हर कमजोरी को हरा सकते हैं, जैसा मैंने कर दिखाया। विश्वास करें, आप भी अपना लक्ष्य पा सकते हैं।

-पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू', दिव्यांग साहित्यकार, चित्रकूट, उप्र

Posted By: Umesh Tiwari

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