हेमराज कश्यप, चित्रकूट : अमीरों की खेती मोती बुंदेलखंड के बदहाल किसानों की तकदीर बदलेगी। तुलसी कृषि विज्ञान केंद्र गनीवां में मीठा जल मोती संवर्धन इकाई का गठन हो गया है। इसमें कृत्रिम मोती संवर्धन का प्रशिक्षण किसानों को दिया जाएगा। हुनरमंद होने के बाद किसान मोती की खेती का कठिन काम आसानी से कर सकेंगे।

हीरा, पन्ना और मोती ऐसे रत्न हैं जो किसी भी की किस्मत को बदल देते हैं। वही मोती अब बुंदेलखंड में शुभ संकेत लेकर आई है। जल्द ही तालाब, पोखर और नदियों में इसकी खेती होगी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने इसके लिए पहल शुरू कर दी है। इंडियन पर्ल कल्चर थाणे महाराष्ट्र के सहयोग से तुलसी कृषि विज्ञान केंद्र गनीवां में मीठा जल मोती संवर्धन इकाई स्थापित की है। यह देश की पहली इकाई है जो किसानों को मोती की खेती का प्रशिक्षण देगी। वैसे तो परिषद की ओर से देश में सन् 1961 से मोती की खेती शुरू की गई थी। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीक से मत्स्य पालन हेतु बनाए गए तालाबों में भी मोती पैदा किया जा सकता है। देश में अंडमान और निकोबार द्वीप समूह एवं लक्षद्वीप के क्षेत्र मोती उत्पादन हेतु काफी अनुकूल पाए गए हैं।

गनीवां में स्थापित इकाई में किसानों को प्रशिक्षण इंडियन पर्ल कल्चर के डा. अशोक मानवानी और डा. कुलंजन मानवानी देंगे। डा.अशोक के मुताबिक अभी तक मोती की खेती अमीर अपने फार्म हाउस में वैज्ञानिकों की देखरेख में करते थे, लेकिन अब बुंदेलखंड में गरीब किसान भी कृत्रिम मोती संवर्धन का काम कर सकेंगे। इसकी खेती कठिन जरूर लेकिन सस्ती है। सिर्फ प्रशिक्षण की जरूरत है। अभी तक वैज्ञानिक खुद शोध में लगे थे मगर अब पूरी दक्षता के बाद इसेआम किसान खेती बनाने की पहल शुरू की गई है जिसके लिए कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक डा. एस अय्यप्पन भी प्रयासरत हैं। उन्हीं के प्रयास से कृषि विज्ञान केंद्र में पहली प्रशिक्षण इकाई गठित हुई है।

उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड में मोती उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। जहां पर बाजार है वहां पर अब सीप नहीं मिलते हैं। यहां की नदियों, तालाबों और पोखरों में इसकी भरमार है। अभी तक उन्होंने खुद मार्जेनिलिस, पायरेसिया कारुगेट और लेमनीडेस कोरियेनस प्रजाति की सीप देखी है।

कैसे करते हैं खेती

मोती की खेती एक कठिन काम है। इसमें विशेष हुनर की आवश्यकता पड़ती है। पहले सीप ली जाती है। मोती की खेती हेतु सीप का चुनाव कर लेने के बाद प्रत्येक सीप में छोटी सी शल्य क्रिया करनी पड़ती है। इस शल्य क्रिया के बाद सीप के भीतर एक छोटा सा नाभिक तथा मैटल ऊतक रखा जाता है। इसके बाद सीप को बन्द कर दिया जाता है। मैटल ऊतक से निकलने वाला पदार्थ नाभिक के चारों ओर जमने लगता है तथा अन्त में मोती का रूप लेता है। कुछ दिनों के बाद सीप को चीर कर मोती निकाल लिया जाता है। मोती की खेती के लिए सबसे अनुकूल मौसम है शरद ऋतु यानि अक्टूबर से दिसंबर तक का समय माना जाता है।

मोती की खेती पर्यटन को देगी बढ़ावा

धर्मनगरी वैसे ही पर्यटकों की पसंद है यदि मोती की खेती शुरू हो गई तो इसके पर्यटन को और बढ़ावा मिलेगा। डा. अशोक ने बताया कि देश और विदेश से आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने वाली मोती की खेती है। उसको मोती निकाल कर बेचा भी जा सकता है।

लागत से कई गुना फायदा

मोती उत्पादन से एक साल में चालीस गुना मुनाफा कमाया जा सकता है। कोई खेती ऐसी नहीं है जिसमें इतना फायदा होती हो लेकिन मोती की खेती में है। डा. अशोक के मुताबिक एक सीप में दो कृत्रिम मोती तैयार होते हैं। इनको तैयार करने में सिर्फ दस रुपए का खर्च आता है। एक मोती तैयार होने के बाद कम से कम दो सौ रुपए में बिचौलिए के माध्यम से आसानी से बेंचा जा सकता है।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर