बुलंदशहर, जेएनएन। अधिकांश लोग धन कमाने और शोहरत पाने के लिए जीवन खपाते हैं, लेकिन बुलंदशहर के हरि अंगिरा के सिर पर पर्यावरण बचाने की ऐसी धुन सवार है, कि पिछले दस साल में एक लाख से अधिक पौधे लगवा दिए हैं। इनमें हजारों दरख्त पेड़ बन चुके हैं और हजारों बन रहे हैं। पर्यावरण जागरूकता के लिए स्कूल, कालेज, डिग्री कालेज और गांव-शहर में 1263 कार्यशालाएं भी कर चुके हैं।

1990 के दशक में पर्यावरण और पेड़ों के अंधाधुंध कटान से पर्यावरण संकट खड़ा होना शुरू हुआ, लेकिन अधिकांश लोग पर्यावरण को लेकर अनभिज्ञ थे। वर्ष 2000 के बाद पर्यावरण असंतुलन बढ़ता चला गया। तब शहर के मोहल्ला ईटा-रोड़ी निवासी हरि अंगिरा समाजसेवा के लिए पत्रकारिता कर रहे थे। इन्होंने वर्ष 2010 में सब कुछ छोड़कर पर्यावरण को बचाने के लिए कुछ करने की ठानी। शुरुआत में लोग साथ नहीं आए, लेकिन बाद में पौधे लगाने और पेड़ बनाने की मुहिम लोग जुड़ते गए और कारवां बनता चला गया। पौधारोपण करने और करवाने की मुहिम को नौ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। इन्होंने पांच हजार से अधिक पौधे खुद भी लगाए हैं, शेष पौधे एनसीसी, स्काउट, एनएसएस के सदस्य, सामाजिक संगठन, छात्र-छात्राओं, अधिकारियों और ग्राम प्रधानों से लगवाए हैं। ये लगाए पेड़

-फलदार पौधों में आड़ू, शहतूत, कटहल, जामुन, शरीफा, आम, अमरूद, छायादार पौधों में पीपल, पिलखन, बरगद, नीम आदि और इमारती लकड़ी के लिए साल, सागौन और शीशम औषधीय पौधों में त्रिफला, अलोवेरा आदि पौधे लगवाए। तीन साल से बुलंदशहर पर फोकस

शुरुआत के सात साल तक गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, दिल्ली, हरियाणा, सहारनपुर और अलीगढ़ में मुहिम चलाई। लेकिन अब अभियान का पिछले तीन साल से केवल बुलंदशहर जिले पर फोकस है। राष्ट्रपति भवन में पौधे लगवाए। छात्रवृत्ति व पेंशन भी दी

पौधे लगाने और पेड़ बनाने की मुहिम में पर्यावरण पुरुष ने 12 छात्रों को छात्रवृत्ति और पांच लोगों को प्रतीकात्मक पेंशन भी दी, ताकि लोग मुहिम से जुड़ें और पर्यावरण बचाने को आगे आएं। गिफ्ट में भी पौधा

लोग जन्मदिन, शादी के रिसेप्शन में गिफ्ट देते हैं, लेकिन हरि अंगिरा छायादार व फलदार पौधा ही गिफ्ट करते हैं और उसे पेड़ बनाने की जिम्मेदारी भी सौंपते हैं। इन्होंने कहा.

लोगों के सहयोग से हमने पर्यावरण संतुलन और जलवायु सुरक्षा को सरकार द्वारा प्राथमिकता और प्रतिबद्धता का विषय घोषित कराने के लिए वर्ष 2017 से बड़ा अभियान चलाया। इसके बाद भारत सरकार ने अगस्त 2019 में इसको स्वीकार भी किया।

-हरि अंगिरा, समाजसेवी एवं पर्यावरण रक्षक

Posted By: Jagran

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