बुलंदशहर में 66,666 लोगों पर कुत्तों ने किया हमला, हर गली और मोहल्ले में इनका आतंक; 8 माह के आंकड़े आए सामने
Bulandshahr News: बुलंदशहर में पिछले आठ माह में 66,666 लोग आवारा कुत्तों के हमले में घायल हो गए। हर माह ...और पढ़ें

HighLights
हर माह आठ हजार से अधिक लोगों को झेलना पड़ रहा दर्द।
राेजाना लगभग 200 मरीजों को एआरवी लगाई जा रही।
जागरण संवाददाता, बुलंदशहर। सुप्रीम कोर्ट के आदेश और तंत्र की रोकथाम के बाद भी आवारा कुत्तों की समस्या सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है। नतीजतन जनवरी से अगस्त तक आठ माह में 66 हजार 666 लोगों को कुत्तों ने घायल किया। औसतन हर माह आठ हजार से अधिक लोगों को सरकारी अस्पतालों में जाकर एआरवी (एंटी रेबीज वैक्सीन) लगवानी पड़ रही है।
स्वास्थ्य विभाग में जिला अस्पताल, 13 सीएचसी और पांच ब्लाक स्तरीय पीएचसी समेत 92 स्वास्थ्य केंद्रों पर वैक्सीन लगाई जाती है। इसमें कुत्ते समेत अन्य जानवरों के काटने के लगभग 12 हजार घायलों को मुफ्त में एआरवी (एंटी रेबीज वैक्सीन) लगाई जाती है। इसमें आवारा और पालतू कुत्ते, बंदर, बिल्ली, नेवला, गीदड़, गधा और घोड़ा आदि जानवरों के काटे मरीज होते हैं। इनमें सबसे ज्यादा मरीजों की संख्या आवारा कुत्तों के हमले से घायलों की होती है। ओपीडी शुरू होते ही कल्याण सिंह राजकीय मेडिकल कालेज से संबद्ध जिला अस्पताल की ओपीडी में एआरवी लगवाने वाले मरीजों की लाइन लग जाती है।
वर्तमान में हर रोज लगभग 200 मरीजों को एआरवी लगाई जा रही है। इसमें औसतन 170 मरीज पहली डोज लगवाने होते हैं। जिन मरीजों के ज्यादा जख्म होता है। उनको एआरएस (एंटी रेबीज सीरम) लगाई जाती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी स्वयं मानते हैं कि यह एक गंभीर समस्या है, क्योंकि एआरवी, एआरएस पर वैक्सीन, सिरिंज और स्टाफ के वेतन समेत प्रतिमाह लगभग 28 लाख रुपए खर्च होते हैं। जिला सर्विलांस अधिकारी डा. रमित सिंह का कहना है कि कोई भी जानवर काटे तुरंत एआरवी लगवाएं। समय से एआरवी लगती है तो रेबीज का खतरा न के बराबर रह जाता है।
एक माह का औसत डेटा
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक एक माह में सात हजार मरीजों को आवारा कुत्ते, 1500 लोगों को पालतू कुत्ते, 438 को बिल्ली, 1580 मरीजों को बंदर, घोड़ा, गधा और नेवला समेत अन्य जानवर काटे के 53 मरीजों को एआरवी लगती है। गहरे जख्म वाले 110 मरीजों को एआरएस लगती है।
हर गली और मोहल्ले में कुत्तों का आतंक
शहर से देहात तक आवारा कुत्तों का आतंक है। छोटे बच्चे गली से सड़क तक स्कूल की बस में बैठने आते हैं तो अभिभावक साथ आते हैं, क्योंकि डर रहता है कि कहीं आवारा कुत्ते बच्चों को काट न लें।
