संजीव शिवांश, बुलंदशहर : भारतेंदु हरिश्चंद्र ने निज भाषा को उन्नति और सब धर्मो का मूल बताया है, लेकिन हिंदी आज तक राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। बोलियां विलुप्त हो रही हैं और हिंदी चिंदी-चिंदी बिखर रही है। अमेरिका हिंदी सीखने पर जोर दे रहा है और हिंदीभाषी अंग्रेजी में गौरव महसूस कर रहे हैं। कुछ रस्म-रवायतों को छोड़ दें तो हिंदी को बढ़ावा देने की बातें कागजों से बाहर नहीं निकल पाई हैं। हिंदी की दशा-दिशा पर हाल ही में भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार से सम्मानित होने वाले अपर जिला बचत अधिकारी राजीव सक्सेना ने दैनिक जागरण से बातचीत की-

सवाल : हिंदी की याद 14 सितंबर को ही क्यों आती है, दावों के बाद भी उसे अपेक्षित दर्जा क्यों नहीं मिल पाया?

जवाब : सभी देश अपनी भाषा पर गर्व करते हैं, जबकि हम हीनभावना से ग्रस्त हैं। हम दशकों तक अंग्रेजों के उपनिवेश रहे हैं, इसलिए अंग्रेजी बोलने में गौरव महसूस होता है। दूसरे समाज जटिल होता जा रहा है औ उसका प्रभाव भाषा पर भी पड़ रहा है। एक खत-ओ-किताबत की भाषा थी और एसएमएस की भाषा है। फर्क कर सकते हैं। भाषा किसी भी देश की संस्कृति और पहचान होती है। अगर उसके प्रति सम्मान और लगाव नहीं है तो ऐसे रस्मी आयोजन हिंदी का भला नहीं कर सकते।

सवाल : क्या आप को नहीं लगता कि इसके लिए आज की शिक्षा पद्धति भी किसी हद तक जिम्मेदार है?

जवाब : नि:संदेह। भाषा-व्याकरण के परिप्रेक्ष्य में छात्रों से प्राथमिक स्तर पर वह मेहनत कराई नहीं जाती, जो पहले होती थी। पहले स्कूलों में बाल सभाएं होती थीं। कहानी सुनी-सुनाई जाती थी। मनोवैज्ञानिक रूप से बालक में अपनी भाषा के प्रति लगाव बढ़ता था। आज देखिए, पुस्तकालय अकाल मृत्यु के शिकार हो रहे हैं। उनका स्थान टेलीविजन ने लिया है। इस सबने हिंदी का भी नुकसान किया है। यही कारण है कि आज के विद्यार्थियों को पूरी वर्णमाला तक याद नहीं है।

सवाल : लेकिन उपयोगितावादी शिक्षा के दौर में रोजगार की दृष्टि से हिंदी में क्या भविष्य है?

जवाब : हिंदी को सिर्फ नौकरी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, वह संवाद का सहज माध्यम है। सिर्फ हमारे यहां ही हिंदी बोलने-इस्तेमाल करने में शर्म-संकोच होती है, ग्लोबल मार्केट में अमेरिका भी हिंदी के समर्थन में है। वहां के राष्ट्रपति अपने लोगों से हिंदी सीखने को कह रहे हैं। दुनिया के 146 देशों में हिंदी पढ़ाई जाती है। क्षमता बढ़ाएं, भविष्य भी सुरक्षित होगा।

सवाल : हिंदी के प्रयोग में अक्सर शुद्धता का आग्रह छोड़ने की बात आती है, यह कहां तक सही है?

जवाब : देखिए हिंदी प्रवाहमान भाषा है। इसने दूसरी भाषाओं के शब्दों को भी अंगीकार किया है, किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि हम अपने शब्दों को पहले बिगाड़ें और फिर शुद्धता की बात करने वालों को पिछड़ों में शुमार करें। यह कष्टप्रद है। उदाहरण के लिए 'निंबूज', 'चटनीज' जैसे शब्द अब दिल्ली जैसे शहरों में सुनने को मिल रहे हैं। यह शब्दों का फ्यूजन है, जो हमारी भाषा के लिए खतरनाक है।

सवाल : बोलियां विलुप्त हो रही हैं, भाषा के लिए यह कितना नुकसानप्रद है?

जवाब : बोलियां हिंदी की उपभाषाएं हैं। भोजपुरी, अवधी, ब्रज, मैथिली में हिंदी का ही मिठास है। अफसोस कि इनमें साहित्य नहीं लिखा जा रहा है। बाबा नागार्जुन की पीढ़ी नहीं रही।

सवाल : कानून की किताबों तक हिंदी क्यों नहीं पहुंच पाई?

जवाब : हर बात के लिए इच्छाशक्ति की कमी बड़ा कारण है। सन् 1950 में हिंदी राज्यभाषा बन गई थी। आज तक राष्ट्रभाषा घोषित नहीं हो पाई। संसद में इस आशय का प्रस्ताव पास कराने का प्रयास ही नहीं हुआ।

सवाल : अंतर्राष्ट्रीय मंच पर हिंदी लेखकों की पुस्तकें क्यों नहीं ठहरतीं?

जवाब : हिंदुस्तानी और खासकर हिंदी के लेखकों का विदेशी लेखकों के साथ तारतम्य नहीं है। हम समय के साथ खुद को ढाल नहीं रहे हैं। नया पढ़ने की आदत नहीं है। इसीलिए वहां अंग्रेजी का साम्राज्य है। भारत के जो लेखक उस मंच पर सफल हुए, उनके साथ प्रकाशकों का गठजोड़ होता है।