विदेशों को नहीं भेजी गई 43 हजार टन राॅ शुगर, अब आ रही देश के उपभोक्ताओं के काम
Bijnor News: बिजनौर की चीनी मिलों ने पिछले पेराई सत्र में सब्सिडी न मिलने के कारण कच्ची चीनी (राॅ शुगर) ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक फोटो
HighLights
सब्सिडी न मिलने से चीनी मिलों ने निर्यात नहीं किया।
बिजनौर की मिलों को चीनी के बेहतर दाम मिल रहे।
जागरण संवाददाता, बिजनौर। पिछले पेराई सत्र में जिले की चीनी मिलों ने अनुदान न मिलने पर विदेश भेजने के लिए राॅ शुगर (बिना रिफाइन हुई चीनी) का एक दाना भी नहीं बनाया।
इसका फायदा अब मिल रहा है। जो चीनी पांच-सात महीने पहले विदेश नहीं गई, वह देश के उपभोक्ताओं के अब काम आ रही है। जिले की चीनी मिलों को 43 हजार मीट्रिक टन से अधिक कोटा मिला था। अब मिलों को भी चीनी के दाम तब से बेहतर मिल रहे हैं।
गन्ना जिले में सबसे ज्यादा कमाई कराने वाली फसल है। जिले में 2.57 लाख हेक्टेयर भूमि में गन्ने की खेती होती है। चीनी मिल और किसानों की आमदनी गन्ने पर निर्भर है और एक दूसरे से जुड़ी हुई है।
पिछले कुछ समय में गन्ने का रकबा, पैदावार और चीनी के उत्पादन में बंपर वृद्धि हुई है। जैसे गन्ने की पैदावार और चीनी का उत्पादन बढ़ा, चीनी के दाम स्थानीय बाजार में कम होने लगे। इससे किसानों का गन्ना भुगतान भी प्रभावित हुआ। बाजार में चीनी की आवक कम करने के लिए तब भारत सरकार ने कदम उठाया और रा शुगर विदेशों में बेचने को हरी झंडी दी।
जिले की चीनी मिलों को भी रा शुगर बनाने का कोटा दिया गया। इसके बाद चीनी के उत्पादन को नियंत्रित करने के लिए मिलों में एथनाल बनाने का काम भी शुरू कराया गया। एथनाल बनाने के लिए गन्ने के रस से मिठास का हिस्सा कम करके उसे शीरे में मिलाया जाता है।
इससे चीनी का उत्पादन 15 प्रतिशत तक कम होता है। पांच वर्ष पूर्व केंद्र सरकार ने रा शुगर के निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। चीनी मिल जो भी चीनी बनाती थीं वे स्थानीय बाजार में ही बिकती थीं।
पिछले वर्ष सरकार ने मिलों को फिर से राॅ शुगर का कोटा दिया था लेकिन इस कोटे पर सब्सिडी नहीं दी। सब्सिडी न मिलने पर मिलों ने भी विदेशों में चीनी नहीं बेची जो अब अपने ही लोगों के काम आ रही है। साथ ही मिलों को भी अच्छे दाम मिल रहे हैं।
इसलिए नहीं बनाई राॅ शुगर
विदेशों में चीनी के दाम भारतीय मुद्रा में तीन हजार 900 रुपये प्रति कुंतल तक मिल रहे थे। स्थानीय बाजार में भी यही दाम थे। पहले केंद्र सरकार द्वारा चीनी भेजने के लिए निर्यात सब्सिडी के तौर पर साढ़े पांच रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी मिलती थी।
पिछले वर्ष सब्सिडी नहीं दी गई। चीनी मिल अगर राॅ शुगर भेजती हैं तो ट्रांसपोर्ट का खर्च उन्हें खुद उठाना पड़ता। यानि साढ़े पांच रुपये प्रति किलोग्राम का नुकसान होता।
तो कम ही बचती चीनी
जिले की चीनी मिलों के पास इस समय लगभग 1.30 लाख मीट्रिक टन चीनी ही बची है। अगर मिलें रा शुगर बनाकर विदेश भेज देतीं तो जो चीनी अभी बची हुई है उसका एक तिहाई हिस्सा और कम होता। यह स्थिति हर जिले में होती। तब चीनी के दाम और भी अधिक होते।
चीनी मिलों को मिला कोटा
- बिजनौर, 2,412
- धामपुर, 9,414
- स्योहारा, 9,111
- नजीबाबाद, 2,490
- बिलाई, 6,787
- अफजलगढ़, 5,730
- बुंदकी, 4,962
- चांगीपुर, 2,401
- योग, 43,307
नोट: कोटा मीट्रिक टन में है।
मिलों ने राॅ शुगर नहीं बनाई थी। उस समय राॅ शुगर बनाने में नुकसान हो रहा था। अगर राॅ शुगर बन जाती तो मिलों के पास और भी कम चीनी बचती। चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य कम से कम साढ़े चार हजार क्विंटल होना चाहिए।
-नरपत सिंह, संयुक्त अध्यक्ष, बरकातपुर चीनी मिल
