12 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता सेनानियों ने फूंका था बगावत का बिगुल, स्टेशन को कर दिया था आग के हवाले
धामपुर में 12 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता सेनानी चौधरी कुलमणि सिंह के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक बड़ी बगावत हुई थी।

जागरण संवाददाता, धामपुर। अंग्रेजी शासन काल में आजादी की लड़ाई के दौरान धामपुर के लिए 12 अगस्त का दिन विशेष रहा था। यहां के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ लंबी और निर्णायक लड़ाई के दौरान 12 अगस्त को अंग्रेजी शासन की नींव हिलाने का कार्य किया था। सेनानियों के बलिदान को नगरवासी आज भी याद करते हैं।
आज से 84 वर्ष पहले 12 अगस्त 1942 को धामपुर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बड़ी बगावत हुई थी। इसमें बड़ा नाम स्वतंत्रता सेनानी स्व. चौधरी कुलमणि सिंह का रहा। उनके नेतृत्व में युवा स्वतंत्रता सेनानियों ने विरोध प्रदर्शन व आगजनी की थी।
मुहल्ला खातियान निवासी चौधरी कुलमणि सिंह के पिता स्व. चौधरी उमराव सिंह भी स्वतंत्रता सेनानी थे। पिता की प्रेरणा से कुलमणि सिंह अल्पायु से ही क्रांतिकारियों के साथ सक्रिय हो गए थे।
वर्ष 1917 में जन्मे कुलमणि सिंह ने 12 अगस्त 1942 को 25 वर्ष की आयु में ही बगावत कर दी थी। इंदिरा नगर कालोनी निवासी 77 वर्षीय वरिष्ठ अधिवक्ता व बार एसोसिएशन धामपुर के संस्थापक अध्यक्ष रहे गजेंद्र सिंह एडवोकेट आज भी उनकी यादें संजोए हैं।
वह चौधरी कुलमणि सिंह के दामाद हैं। 1973 में उनकी पुत्री मंजुला सिंह के साथ गजेंद्र सिंह का विवाह हुआ। वह बताते हैं कि विवाह के बाद से कुलमणि सिंह के साथ अत्यंंत स्नेह रहा, वह अपने जीवन के प्रसंग और आंदोलन के वृतांत सुनाते थे। मुहल्ला खातियान स्थित आवास पर तीन मार्च 1976 को चौधरी कुलमणि का निधन हुआ था।
सरकारी दफ्तर व दस्तावेज किए आग के हवाले
गजेंद्र सिंह बताते हैं कि कुलमणि सिंह वर्ष 1941 में गिरफ्तार हुए थे, एक वर्ष सश्रम कारावास बिजनौर जेल में काटा। सहबंदियों को आंदोलन के लिए तैयार करने से अंग्रेज अधिकारी परेशान हो गए और उन्हें बरेली जेल व केंद्रीय कारागार फतेहगढ़ भिजवा दिया। 1942 में वापस लौटकर 12 अगस्त के दिन उन्होंने विद्रोह का बिगुल फूंका।
पुरानी तहसील के पास मौजूद पिलखन के पेड़ के नीचे युवाओं को एकजुट कर विशाल जुलूस निकाला। यह पेड़ आज भी राजकीय कन्या इंटर कालेज परिसर में मौजूद है। उस समय नारेबाजी करते हुए स्कूल बंद करा दिए गए थे।
मुहल्ला गुजरातियान में सरकारी गल्ला गोदाम पर चढ़ाई कर राशन गरीबों में बांट दिया। थाना, रेलवे स्टेशन, डाकघर में सरकारी दस्तावेजों व फर्नीचर को आग के हवाले कर दिया। रेलवे सिगनल प्रणाली के तार काट दिए, जिससे रेल यातयात ठप हो गया था।
शेर को घर में नहीं ढूंढते हैं...
विद्रोह से अंग्रेज बौखला गए थे। बिजनौर से बड़े अधिकारी पहुंचे और शहर में ताबड़तोड़ गिरफ्तारी कीं। जब कुलमणि सिंह के घर पहुंचे तो उस दिन तीज का त्योहार था। महिलाएं झूला झूल रही थीं, अधिकारी ने जोर-जोर से आवाज लगाई। कुलमणि सिंह की बहन ने बाहर आकर कहा कि शेर जंगल में रहता है... उसे घर में नहीं ढूंढा करते हैं। अधिकारी चुपचाप लौट गए।
बाद में एक दिसंबर 1942 को मुखबिर की सूचना पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। बिजनौर अदालत ने डिफेंस आफ इंडिया रूल्स के अंतर्गत दो वर्ष कठोर कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई। 24 मार्च 1943 को जिला कारागार मेरठ भेजा गया, सजा पूरी होने पर वहीं से रिहा हुए।
