बिजनौर, जागरण टीम। एक जमाना था जिले की सातों सीटों पर कांग्रेस का परचम लहराता था, लेकिन 1980 के दशक में देश और प्रदेश में चली मंडल-कमंडल की ऐसी लहर चली, कि कांग्रेस भी सत्ता से बाहर हो गई। इसका असर बिजनौर जिले में भी दिखाई दिया है। 1985 से लेकर 2017 तक हुए विधानसभा चुनाव में जिले में कांग्रेस का खाता खुलना तो दूर कांग्रेस के उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए।

आजादी के बाद 1951 में हुए पहले और 1957 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का जनपद की सभी विधानसभा सीटों पर कब्जा रहा, कितु 1962 में कांग्रेस को पांच सीटें मिली, जबकि दो सीटों पर बीकेडी के प्रत्याशी चुनाव जीते। 1967 में कांग्रेस ने फिर सभी सीटें जीती, जबकि 1974 में कांग्रेस ने पांच, बीकेडी और जनता दल ने एक-एक सीट पर विजयी रही। 1977 में कांग्रेस सभी सीटों पर विजयी हुई, तो 1977 में इमरजेंसी लागू होने के बाद 1979 में हुए चुनाव में कांग्रेस का पत्ता साफ हो गया। सरकार के अल्पमत में आने के बाद 1980 और इसके बाद 1985 में कांग्रेस का सितारा बुलंद हुआ और जिले की सभी सीटों पर कांग्रेस का कब्जा रहा। 1989-1990 में शुरू हुए मंडल कमीशन और राम आंदोलन की ऐसी लहर चली, कि सूबे की राजनीति से कांग्रेस का पत्ता साफ हो गया, इसका असर बिजनौर जिले में भी दिखाई दिया। 1990 में कांग्रेस को जिले की राजनीति से ऐसा बनवास मिला, कि अब तक कांग्रेस की बनवास से वापसी नहीं हो पाई।

जिले में 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में जिले की सातों सीटों पर भाजपा, 1993 में हुए चुनाव में चार पर भाजपा, एक सीपीएम, 2002 में दो भाजपा, दो सपा, एक बसपा, एक रालोद, एक सीपीएम, 2007 में सभी सीटों पर बसपा, 2012 में दो भाजपा, तीन बसपा और दो सपा, जबकि 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में छह भाजपा और दो सीट पर सपा उम्मीदवार विजयी हुए थे। नूरपुर विधानसभा सीट पर विधायक लोकेंद्र चौहान की मौत के बाद हुए उपचुनाव में सपा उम्मीदवार चुनाव जीत गए थे। हालांकि कांग्रेस को आक्सीजन देने के लिए 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने रोड शो किया, जबकि फरवरी 2021 में चांदपुर में जनसभा को संबोधित किया, कितु अभी तक कांग्रेस का जिले की राजनीति में वर्चस्व नहीं बढ़ पाया।

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