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दिल्ली-NCR में प्रदूषण पर ब्रेक लगाएगा बिजनौर, हरियाणा की पराली से बनाया जा रहा बायो पैलेट

Published: Sat, 10 Oct 2026 12:30 PM (GMT+05:30)

बिजनौर के तीन दोस्त हरियाणा की पराली और अन्य फसल अवशेषों से बायो पैलेट बनाकर दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

यह तस्वीर AI जेनेरेटेड है

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HighLights

  1. बिजनौर के दोस्त पराली से बायो पैलेट बना रहे

  2. हरियाणा की पराली दिल्ली-एनसीआर प्रदूषण घटा रही

  3. बायो पैलेट कोयले का स्वच्छ विकल्प, निर्यात भी

जागरण संवाददाता, बिजनौर। दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण के फैलने की रफ्तार पर जिले से ब्रेक लगाए जा रहे हैं। हरियाणा की पराली से जिले में बायोपैलेट बनाए जा रहे हैं। इस वर्ष भी लगभग एक हजार टन पराली से बायो पैलेट बनाए गए हैं। हरियाणा के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों से भी पराली व अन्य फसल अवशेष खरीदे जा रहे हैं।

दिल्ली और एनसीआर की हवा की खराब गुणवत्ता को ठीक करना लगातार चुनौती बना हुआ है। एक्यूआई खराब होने का एक कारण हरियाणा के किसानों द्वारा फसल अवशेष विशेष रूप से पराली जलाने को माना जाता है। जिले के रहने वाले तीन दोस्तों अनूप सिंह, पुलकित सिंह व अंकित कुमार ने लगभग चार वर्ष पहले फसल अवशेष से बायो पैलेट बनाना शुरू किया था।

यह एक प्रकार का ईंधन होता है जो फैक्ट्रियों में बॉयलर में काम आता है। यह बायोपैलेट पौलेंड, बेल्जियम आदि देशों में भी जा रहे हैं। पिछले वर्ष इन दोस्तों ने हरियाणा से भी बिचौलियों के जरिए पराली खरीदी थी।

लगभग तीन रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से पराली खरीदी गई। पिछले वर्ष उन्होंने 800 टन पराली खरीदी थी। इस वर्ष एक हजार टन से अधिक पराली खरीदी है। यानी जितनी अधिक पराली खरीदी गई उतना ही वायु प्रदूषण कम होगा। साथ ही बायो पैलेट भी ईंधन के रूप में वायु प्रदूषण नहीं करते हैं।

बनाए तीन हजार मीट्रिक टन बायोपैलेट

अनूप सिंह, पुलकित सिंह व अंकित कुमार कुमार ने पिछले एक वर्ष में किसानों ने सात हजार टन फसल अवशेष खरीदे हैं। वे खेत से ही 80 पैसे से तीन रुपये प्रति किलोग्राम तक फसल अवशेष खरीदते हैं। फिर इन्हें मशीन से कंप्रेस करके बायो पैलेट बनाते हैं। बायोपैलेट फैक्ट्रियों में कोयले के विकल्प के रूप में प्रयोग होती है। अलग अलग फसल अवशेष के अलग अलग दाम मिलते हैं।

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एक टन फसल अवशेष से निकलने वालीं गैस

  • 1460 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड
  • 06 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड
  • 03 किलोग्राम पार्टिकुलेट मैटर
  • 02 किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड
  • 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन
  • 2.3 किलोग्राम फास्फोरस
  • 25 किलोग्राम पोटेशियम

कोयले के जलने से भी नुकसान

जलने के बाद कोयले की 14 से 16 प्रतिशत राख बनती है। यह राख भी पर्यावरण में उड़कर प्रदूषण का कारण बनती है जबकि बायोपैलेट में चार प्रतिशत से कम राख बनती है। कोयला जलाने पर सल्फर और नाइट्रस ऑक्साइड गैस निकलती हैं जबकि बायोपैलेट जलाने पर ये दोनों गैस नहीं निकलतीं।

फसल अवशेष खुले में जलाने से खेती की उर्वरा शक्ति के अलावा पर्यावरण को भी बहुत नुकसान होता है। फसल अवशेष का बायोपैलेट बनाना भी अच्छा विकल्प है। जिले में इस पर काम किया जा रहा है।

                                                                                   रणविजय सिंह, सीडीओ