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1857 की क्रांति: एक साल तक आजाद रहा था बिजनौर, यहां से होती थी मेरठ-दिल्ली के क्रांतिकारियों को रसद आपूर्ति

By Ajeet Chaudhary Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sat, 09 May 2026 06:26 PM (IST)

1857 की क्रांति में बिजनौर जिला लगभग एक साल तक अंग्रेजों से मुक्त रहा। इस दौरान मेरठ और दिल्ली के ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक फोटो

प्रतीकात्मक फोटो

HighLights

  1. 20 मई 1857 को जिला जेल का दरवाजा तोड़ कर कैदियों को मुक्त कराया गया।

  2. अंग्रेज अधिकारियों ने यहां का नियंत्रण महमूद खां को सौंप दिया था

अजीत चौधरी, बिजनौर। मेरठ में 1857 को हुई क्रांति का असर जिले में भी हुआ था। तब जिले से अंग्रेज अधिकारी भाग गए थे। लगभग साल भर तक जिला अंग्रेजों की गुलामी से आजाद रहा था। मेरठ व दिल्ली को क्रांतिकारियों के लिए लिए खाद्यान्न आदि एकत्र करने की जिम्मेदारी जिले के लोगों को दी गई थी। जिले के लोगों ने क्रांतिकारियों के लिए सच्चे मन से दान दिया था।

10 मई 1857 को मेरठ में धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में क्रांति की चिंगारी जली। असंख्य बलिदान देकर क्रांतिकारियों ने कुछ ही दिनों में मेरठ को मुक्त करा लिया। इसकी आग 13 मई के आसपास बिजनौर में पहुंचने लगी। 16 मई को बिजनौर से एक सरकारी सेवक मेरठ की ओर चला। रावली गंगा घाट पर उसे अंग्रेजी तंत्र का आदमी मानकर क्रांतिकारियों ने उससे सरकारी धन लूट लिया।

वह भागकर वापस बिजनौर पहुंचा और उसने मेरठ में क्रांति होने की खबर दी। धीरे धीरे क्रांतिकारियों का दबाव बढ़ता गया। 20 मई 1857 को जिला जेल बिजनौर का दरवाजा तोड़ कर कैदियों को मुक्त करा लिया गया। सात जून 1857 को बिजनौर के अंग्रेज अधिकारियों ने इस शर्त के साथ यहां का नियंत्रण महमूद खां को सौंप दिया कि उनको मारा न जाए और सुरक्षित जिले से बाहर जाने दिया जाए। नवाब ने अंग्रेजों को जाने दिया। जिले में रह रहे ज्यादातर अंग्रेज अपने परिवारों के साथ नैनीताल चले गए थे।

17 अप्रैल 1858 तक बिजनौर का नियंत्रण स्थानीय लोगों के पास रहा। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हर जिले के लोगों को अलग अलग जिम्मेदारी दी गईं थीं। तब बिजनौर के लोगों को क्रांतिकारियों के लिए खाद्यान्न एकत्र करने की जिम्मेदारी दी गई। जिला बिजनौर की भूमि उपजाऊ रही है। यहाँ गेहूं, चावल, सरसों, अरहर, मूंग, उड़द, गन्ने का अच्छा उत्पादन होता था। किसान खाद्यान्न प्रचुर मात्रा में भंडारित करके भी रखते थे। लोगों ने दिल खोल कर क्रांतिकारियों के लिए अनाज और रसद भेजी।

रसद इकट्ठा होती और नावों से गंगा पार भेजी जाती। हालांकि इस अवधि में जिले में धार्मिक रंग में रंगे कई बड़े झगड़े हुए। 17 अप्रैल 1858 को अंग्रेज अधिकारियों ने बिजनौर पर फिर से अधिकार कर लिया था। एक साल चली इस लड़ाई में बहुत संघर्ष हुआ था। इसमें नगीना में विश्नोई समाज के बावन क्रांतिकारियों का बलिदान हुआ था। इनके अलावा सैकड़ों लोगों ने बलिदान दिया था।

क्रांतिकारियों के दल में बिजनौर सहित कई जिलों के लोग थे शामिल: हेमंत कुमार

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इतिहासकार फीना निवासी हेमंत कुमार ने अपनी पुस्तक जनपद बिजनौर का परिचय में लिखा है कि 1857 से 1858 के दौरान एक साल की अवधि में दिल्ली व मेरठ के क्रांतिकारियों को रसद की मुख्य आपूर्ति का जिम्मा बिजनौर को दिया गया था। तब क्रांतिकारियों के दल में बिजनौर, मुरादाबाद, मेरठ, बुलंदशहर जैसे कई जिलों के लोग शामिल थे।

हेमंत कुमार के अनुसार इनके भोजन के लिए अन्न का अधिकांश हिस्सा जिला बिजनौर से भेजा जाता था। प्रथम स्वतंत्रता क्रांति की घटनाओं को तत्कालीन सदर अमीन सैय्यद अहमद खां ने बहुत गहराई से लिखा था।
उनकी किताब सरकशी ए जिला बिजनौर में लगभग एक साल चली आजादी की घटनाओं को काफी व्यवस्थित तरीके और विस्तार से लिखा गया है। यह प्रथम क्रांति की जानकारी का मुख्य स्रोत है। प्रथम क्रांति में एक बड़े नाम और जनरल रहे बख्त खान भी जनपद बिजनौर मूल के ही हैं।