बिजनौर: जंगलों से निकल खेतों में बसे गुलदार, बढ़ रहा वजन और घट रही फुर्ती; WII के सर्वे में खुलासा
जंगलों से निकलकर खेतों में आए गुलदारों के स्वभाव में चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां उनका ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
गुलदारों का वजन बढ़कर 95-97 किलोग्राम तक पहुंचा।
रोशनी या तेज आवाज से अब नहीं डरते गुलदार।
खेतों में आसान शिकार से आलसी हो रहे हैं गुलदार।
अजीत चौधरी, बिजनौर। जंगलों को छोड़कर इंसानी आबादी और खेतों का रुख करने वाले गुलदारों के स्वभाव में चौंकाने वाला बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआइआइ) के हालिया सर्वे और वन विभाग के आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि की है कि वनों से निकलकर खेतों में आया गुलदार न रोशनी करने से भागता है न तेज आवाज से। उसका वजन बढ़ रहा है और वह आलसी हो रहा है।
गुलदार आसान शिकार की तलाश में गांवों की ओर रुख कर रहा है। गुलदार की नई पीढ़ी शरीर से और भी भारी और आलसी हो सकती है। 2016 के आसपास अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ने के कारण गुलदारों ने जंगल छोड़कर बाहर का रुख करना शुरू किया था। अब खेतों में जहां-तहां दिख जाते हैं।
यहां तक कि गुलदार की टेरिटरी रामपुर, मुरादाबाद, संभल और अमरोहा जिले तक पहुंच चुकी है। शुरुआत में गुलदार मनुष्यों को देखकर खेतों में भाग जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है। डब्ल्यूआइआइ गुलदारों के स्वभाव पर सर्वे कर रही है। टीम वन विभाग के साथ मिलकर गांवों में जा रही है और गांव वालों से बात कर रही है। गांव वालों ने टीम को बताया कि टार्च की रोशनी करने या गाड़ी की हेडलाइट सामने आने पर भी अब गुलदार नहीं भागता।
गाड़ी के हार्न या शोर मचाने पर भी नहीं भागता है। उल्टे वह रात में बाइक सवारों पर हमला कर रहा है। इंसानों के सामने आकर आराम से बैठ जाना अब आम बात हो गई है। आमतौर पर गुलदार का वजन 60 से 65 किलोग्राम तक माना जाता है लेकिन हाल ही में वन विभाग की ओर से पकड़े गए गुलदारों का वजन 95 से 97 किलोग्राम तक मिला है।
इन गुलदारों के शरीर में लचीलापन या फुर्ती वन के गुलदार की अपेक्षा कम है। डीएफओ जय सिंह कुशवाहा का कहना है कि खेतों व गांवों के पास आसान शिकार मिलने और कोई खतरा न होने के कारण बेपरवाही की जीवनशैली के कारण ऐसा हुआ है। सीसीटीवी कैमरों में कैद गुलदार रात को गांवों में चौकन्ना होने के बजाय आराम से घूमते हुए दिखते हैं। खेतों में पैदा होने वाली पीढ़ी के शरीर की फुर्ती और भी कम हो सकती है।
