सर्वेश कुमार मिश्र

ज्ञानपुर (भदोही) : संत वह है जो प्रमाणिक हो, पदमुक्त हो, कोई अभिलाषा न हो, प्रतिष्ठा की कामना न हो। काम, क्रोध और कपट से कोई रिश्ता नाता न हो। समाज सुधार, राष्ट्र सुधार और विश्व सुधार का भाव हो तथा आचार संहिता, राष्ट्र संहिता और विश्व संहिता से बंधा हो। प्रमाणिकता के साथ पवित्रता और परमार्थमुखी भी होना जरूरी है। इन्हीं सब गुणों के आधार पर संतों को प्रमाणित करने के लिए गठित शिथिल सी पड़ी अखिल भारतीय संत उच्चाधिकार समिति आसाराम बापू के कथित यौन प्रकरण के बाद फिर से सक्रियता की ओर बढ़ चली है। 51 सदस्यीय इस समिति के सदस्य भदोही के कारीगांव निवासी स्वामी ब्रह्मदेव इसकी सक्रियता को लेकर बेहद सक्रिय हैं।

सत्यमित्रानंद गिरी (हरिद्वार) व जयेंद्र सरस्वती प्रमुख पद के लिए चुने गए। देश के जाने-माने साधु-संत इस समिति के सदस्य बनाए गए। सभी 13 अखाड़ों के आचार्य भी इसमें शामिल हैं। समिति का उद्देश्य था कि कोई भी महात्मा या साधु अपने को तब तक संत नहीं लिख सकेगा जब तक यह समिति उन्हें इसका प्रमाण न दे। विवादों से बचने के लिए ज्यादा से ज्यादा मतावलंबियों को इसमें शामिल किया गया। मकसद साफ था कि इस तरह से वही लोग संत कहलाने के अधिकारी होंगे जो वास्तव में इसकी पात्रता रखते हों। इससे शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, बल्लभाचार्य, माधवाचार्य, निंबारिकाचार्य तथा चैतन्य परंपरा के लोग एक मंच पर आए लेकिन ब्रह्मकुमारी राजयोगा, आशाराम, कृपालु महराज, श्री सत्य साईं बाबा आदि इससे नहीं जुटे। बावजूद इसके तय हुआ कि यह समिति निश्चित करेगी कि कौन खुद को संत कह, लिख और बोल सकेगा। हालांकि इसके अमल में आ रही कुछ दिक्कतों के कारण यह समिति शिथिल सी पड़ गई थी। हाल के आसाराम बापू समेत कई साधुओं के यौन प्रकरण में नाम आने के बाद इस समाज के गरिमा पर धक्का लगा है। ऐसे में फिर से यह समिति सक्रिय हो उठी है। जिले के कारी गांव स्वामी ब्रह्मदेव जी महराज इस समिति के प्रमुख पदाधिकारियों में एक हैं।

यह भी हैं समिति में

समिति के सदस्य देश के कोने कोने से हैं। इसमें माधवाचार्य पेशावर, गोविंद गिरी, स्वामी अवधेशानंद महराज, रामभद्राचार्य, नृत्यगोपालदास, स्वामी चिम्यानंद आदि जाने-माने संत ही प्रमुख हैं।

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नृत्य, संगीत, ज्ञान-विज्ञान भी जरूरी

समिति का काम यह भी है कि वह इन संतों को संवेदनशील क्षेत्रों में जाने के लिए प्रेरित करें। वहां वह शांति व्यवस्था कायम करने व इसे धर्म से जोड़कर प्रचार-प्रसार करें। धर्म का प्रांतीय भाषा में अनुवाद करने की कला हो। आयुर्वेद, ज्योतिष, कला, नृत्य-संगीत, योग और विज्ञान का ज्ञान हो। शाकाहारी भोजन करने वाला हो।

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संत समाज का पथ प्रदर्शक माना जाता है। ऐसे में जब लोग खुद से संत कहने, कहलाने लगेंगे तो दिक्कत तो होगी है। बड़ी अच्छी बात है कि इस तरह के लोग इससे जुड़े हैं जिनके आदर्श अनुकरणीय हैं। उसके लिए भी आचार संहिता जरूरी है। मै खुद इससे जुड़ा होने पर गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। यह भदोही ही नहीं पूर्वाचल व देश के लोगों का स्नेह-प्यार है।

-स्वामी ब्रह्मदेव महराज, पीठाधीश ब्रह्मविद्यापीठम व वैदिक विश्वविद्यालय वेस्टइंडीज के उपकुलपति।

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