धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने से बरेली में बदला सियासी गणित, BJP की इन 4 सीटों पर फंसा पेंच!
धर्मेंद्र कश्यप के सपा में शामिल होने से बरेली में भाजपा की चुनावी चुनौतियां बढ़ गई हैं। पार्टी को आंवला, ...और पढ़ें

लखनऊ में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप, साथ में पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव, जिलाध्यक्ष शुभलेश यादव, कीर्ति कश्यप और पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार। सौ. सपा
HighLights
भाजपा के लिए आंवला, बिथरीचैनपुर, कैंट और फरीदपुर में बढ़ सकती है मुश्किल
पिछली बार भोजीपुरा-बहेड़ी में हुई हार, कैंट और फरीदपुर में था जीत का कम अंतर
अशोक आर्य, बरेली। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के सामने जिले में अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के साथ कमजोर सीटों पर वापसी करने की चुनौती होगी। पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप के भाजपा छोड़कर सपा में शामिल होने से पार्टी के सामने नए सियासी समीकरण साधने की चुनौती बढ़ गई है।
आंवला से पांच बार विधायक रहे कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह के राज्यसभा पहुंचने के बाद इस सीट पर नए प्रत्याशी की तलाश भी भाजपा के लिए अहम होगी। ऐसे में पार्टी को पिछली चुनावी स्थिति के साथ जातीय समीकरणों और बदले राजनीतिक हालात को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी।
जिले की नौ विधानसभा सीटों पर पिछले चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए कई संकेत छोड़ गए थे। भोजीपुरा और बहेड़ी सीट पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था, जबकि कैंट सीट महज 768 वोटों से जीत सकी थी।
फरीदपुर में भी जीत का अंतर करीब तीन हजार वोट रहा था। ऐसे में भाजपा के सामने पहले से ही हारी हुई सीटों पर वापसी करने और कम अंतर वाली सीटों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की चुनौती थी।
अब धर्मेंद्र कश्यप के सपा में जाने से कुछ अन्य सीटों पर भी मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है। आंवला सीट पर भाजपा को नया प्रत्याशी उतारना होगा। धर्मपाल सिंह लंबे समय से इस क्षेत्र की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं।
ऐसे में उनके स्थान पर पार्टी किसे मौका देती है और नया प्रत्याशी मतदाताओं के बीच कितनी स्वीकार्यता हासिल कर पाता है, यह चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होगा। भाजपा के लिए यहां संगठन की मजबूती के साथ स्थानीय समीकरणों को साधना भी जरूरी होगा।
धर्मेंद्र कश्यप का प्रभाव आंवला के साथ बिथरीचैनपुर, कैंट और फरीदपुर क्षेत्र में भी माना जाता है। उनके सपा में शामिल होने से इन क्षेत्रों में भाजपा के सामने चुनौती बढ़ सकती है। धर्मेंद्र कश्यप अपनी बेटी कीर्ति कश्यप को बिथरीचैनपुर से चुनाव लड़ाने की तैयारी कर रहे हैं।
पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा ने करीब 16 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। आगामी चुनाव में इस बढ़त को बरकरार रखना पार्टी के लिए आसान नहीं माना जा रहा है।
सपा पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए के समीकरण को केंद्र में रखकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटी है। वहीं, भाजपा भी विभिन्न सामाजिक वर्गों में अपनी पकड़ बढ़ाने के प्रयास कर रही है।
हाल में पिछड़ा वर्ग के नेताओं को राज्यसभा भेजने को भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर नेताओं का प्रभाव, प्रत्याशियों की छवि और संगठन की सक्रियता चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव भी चुनावी गणित पर असर डाल सकते हैं। ऐसे में भाजपा को अपनी पुरानी बढ़त के भरोसे रहने के बजाय कमजोर क्षेत्रों में सक्रियता बढ़ानी होगी।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, आगामी चुनाव में पार्टी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह नए चेहरों, सामाजिक समीकरणों और स्थानीय असंतोष को कितनी प्रभावी ढंग से साध पाती है।
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