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जेएनएन, बरेली : हिंदी मातृ भाषा वैश्वीकरण का दंश ङोल रही थी। कंप्यूटर, सोशल मीडिया के चलते अंग्रेजी की घुसपैठ से युवा वर्ग ही इससे दूर होने लगा था। अब वक्त और इस भाषा की सामर्थ्य तस्वीर बदली है। राजकीय मॉर्डन जिला पुस्तकालय में हिंदी फिर उन्हीं युवाओं के बीच फल-फूल रही है जहां एक दो साल पहले तक चंद बुजुर्ग ही साहित्य पढ़ने आते थे। हिंदी दिवस के मौके पर हकीकत परखने पहुंची दैनिक जागरण की टीम को यही सुखद दृश्य मिला।

23 हजार किताबों का संसार
राजकीय पुस्तकालय में करीब 23 हजार किताब हैं, जिनमें 15 हजार अकेले हिंदी की हैं। इनमें देश के प्रख्यात साहित्यकारों की कृतियां, कवियों की रचनाएं, आत्मकथा, लेख, प्रेरक पुस्तकें शामिल हैं। कुछ साल पहले तक सिर्फ कंपटीशन या परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा ही आते थे। अब कॉलेज हिंदी साहित्यप्रेमी युवा भी लाइब्रेरी का रुख करने लगे। इसकी सदस्य संख्या बढ़ी है।

लाइब्रेरी की किताबों पर एक नजर 

  • कुल पुस्तक : 22800
  • हिंदी की पुस्तकें : 15000
  • उर्दू की पुस्तकें : 500
  • संस्कृत : 60
  • सभी कंप्टीशन की पुस्तकें : 800
  • पुस्तकालय की सदस्यता में वृद्धि : 20 प्रतिशत
  • सदस्यता का शुल्क : 200 रुपये

बरेली के साहित्यकारों की भी 250 पुस्तकें
पुस्तकालय में बरेली के प्रमुख साहित्यकारों की भी करीब 250 पुस्तकें हैं। प्रो. वसीम बरेलवी, राधेश्याम कथावाचक, महाश्वेता चतुर्वेदी, किशन सरोज, सुधीर विद्यार्थी, डॉ. ब्रजेश्वर सिंह, ज्ञानवती सक्सेना की कृतियां उपलब्ध हैं।

युवा बोले, ट्रेंड में अंग्रेजी, हिंदी है दूर
पुस्तकालय में मिले युवाओं से हिंदी का महत्व पूछा। वह बोले अंग्रेजी एक ट्रेंड बन गई है। इसी से हम अपनी मातृभाषा से दूर होते जा रहे हैं। बदलाव आ रहा है।

बोले हिंदी प्रेमी 

हम हिंदी की मुख्यधारा से हटकर अंग्रेजी की ओर जा रहे हैं। यह पतन की निशानी है। हमें मातृभाषा पर जोर देना चाहिए। - राजीव चंद्रा
हमारी मातृभाषा हिंदी है जो पिछड़ती जा रही थी। अब इसको बचाने के लिए युवा वर्ग साहित्य से जुड़ रहा है। इससे आने वाली पीढ़ी नहीं भटकेगी। - राजकुमार सिंह
हम भारत में रहते हैं जहां मातृभाषा हिंदी है, फिर भी यहां साक्षात्कार अंग्रेजी में लिया जाता है। सरकार को भी ध्यान देना चाहिए। - अंशिका मिश्र
पुस्तकालय में कुछ समय पूर्व जहां बुजुर्ग आते थे वहां अब वहां युवा पीढ़ी ज्यादा आ रही है। उनका रुझान बढ़ा है। - ब्रजेश गोस्वामी, केयर टेकर, राजकीय जिला पुस्तकालय

Posted By: Abhishek Pandey

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