वसीम अख्तर, बरेली : एक जमाने तक शहर की पहचान इसके बाग हुआ करते थे। वक्त ने करवट बदली। आबादी बढ़ी तो आसमान छूते छायादार और फल देने वाले पेड़ों की जगह आलीशान कोठियां और मकान खड़े होते चले गए। बाग कटते गए लेकिन नाम बाकी रहा। जब कभी खास-ओ-आम की जुबां पर रामपुर बाग, मिर्जाई बाग, बाग विरक्तान, बाग अहमद अली खां, लीची बाग, हुसैन बाग, बड़ा बाग, केला बाग, फूलबाग जैसे मुहल्लों का जिक्र आता है तो गुजरे जमाने की यादें जहन में ठंडी हवा का झोंका बनकर दस्तक देने लगती हैैं। शहर के सबसे पुराने बाग के तौर पर मिर्जाई मस्जिद के बाग का नाम लिया जाता है। रामपुर बाग उसके बाद का है। एक बाग से मुगलिया दौर की पहचान जुड़ी है तो दूसरा रामपुर के नवाब की आन-बान-शान की याद ताजा करता है। बागों के नाम पर बसे मुहल्लों की दास्तान रोचक है। पहली कड़ी में बता रहे हैं मिर्जाई बाग और रामपुर बाग की कहानी...

मिर्जाई बाग 

पुराना शहर के मुहल्ला घेर जाफर खां में सबसे पुरानी मस्जिद है- मिर्जाई मस्जिद। इसका नाम मिर्जा एन-उल-मुल्क के नाम रखा गया। इतिहास के जानकार शाहीन रजा जैदी बताते हैैं कि देश में मुगलिया सल्तनत के दौरान मुगल बादशाह ने मिर्जा एन-उल-मुल्क को अपना नाजिम व फौजदार बनाकर बरेली भेजा था। गजेटियर के मुताबिक उनसे पहले हुसैन खां टुकडिय़ा यहां के फौजदार थे।

मिर्जा एन-उल-मुल्क ने सन् 1581 ई. में यहां मस्जिद का निर्माण कराकर बाग भी विकसित किया। मस्जिद की बनावट मुगलकालीन वास्तुकला का शानदार नमूना है। करीब साढ़े 400 साल गुजरने के बाद भी मस्जिद का पुराना स्वरूप बरकरार है। मस्जिद के आसपास बाग अब नहीं रहा। नई पीढ़ी को उसके बारे में जानकारी भी नहीं है। हालांकि पुराने लोगों के जहन में बाग अभी जिंदा है।

मस्जिद के मुतवल्ली फरीद खां भी बताते हैैं कि बाग के बारे में उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है। मिर्जाई मस्जिद को पदशाही मस्जिद भी कहा जाता है। इसी मस्जिद के नाम पर बाग का नाम पड़ा और बाग के नाम पर यहां पूरा मुहल्ला आबाद है।

रामपुर बाग

रामपुर रियासत की स्थापना से पहले नवाब फैजुल्ला खां बरेली में ही रहे। जब रामपुर गए, तब भी बरेली में आरामगाह के तौर पर रामपुर बाग की कोठी आबाद रखी। रामपुर नवाब के प्रतिनिधि देवेश गंगवार बताते हैैं कि रामपुर बाग कभी 820 बीघा में फैला हुआ था।

मर्जर एग्रीमेंट की वजह से यहां जमींदारी उन्मूलन एक्ट प्रभावी नहीं हुआ। सन् 1922 से लेकर 1953 तक कोठी व बाग नवाब रजा अली खां और उनके बाद नवाब मुर्तजा अली खां के नाम आ गई। नगर पालिका से लेआउट प्लान मुर्तजा कॉलोनी के नाम से पास हुआ। जब जगह बिकी तो 35 ए से जेड तक ब्लॉक बनाए गए।

कोठियों से पहचान

रामपुर बाग में भले ही नवाब रामपुर की 820 बीघा वाली कोठी अब नहीं रही लेकिन शहर की बड़ी कोठियां अब भी यहीं हैैं। अयूब खां चौराहा और डीडीपुरम के बाद शहर का यह तीसरा सबसे महंगा इलाका है। बड़े डॉक्टरों ने यहां अस्पताल भी खोल रखे हैैं। रामपुर बाग इलाके का एक सिरा चौकी चौराहा तो दूसरा विकास भवन के सामने जाकर निकलता है।

बाग का हिस्सा था बरेली कॉलेज

नवाब मुर्तजा अली खां ने बरेली कॉलेज के लिए 1953 में 24 बीघा जमीन दान दी थी। इसके अलावा 10 हजार वर्ग गज जमीन राष्ट्रपति के नाम बेची गई। जहां आयकर भवन बनाया गया। 80 हजार वर्ग गज जमीन राज्यपाल के नाम हुई। वहां हाइडिल कॉलोनी बनी। कुछ जमीन पट्टाें पर दी गई थी, जिस पर अब भी नवाब रामपुर का स्वामित्व है।

अब इस जगह के रामपुर के अंतिम नवाब मुर्तजा अली खां के बेटे मुहम्मद अली खां उर्फ मुराद मियां और बेटी निगहत आब्दी हैैं। रामपुर बाग में एक पार्क के लिए भी जमीन छोड़ी गई। यहां अब अग्रसेन पार्क है। लोग बताते हैं कि सन् 1955 में यहां की जमीन पांच रुपये वर्ग गज तक बिकी।

 

सरकारी संपत्ति घोषित कर बचाया बाग 

रामपुर बाग के सामने ही कंपनी गार्डन था। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान इस बाग को पार्क में तब्दील कर दिया गया। सरकारी संपत्ति घोषित हो जाने से कंपनी बाग में पेड़ और हरियाली अब भी कायम है। इसे गांधी उद्यान के नाम से भी जाना जाता है।

यह शहर का सबसे बड़ा पार्क है। वक्त गुजरने के यह साथ संवर रहा है। नगर निगम अब तक कंपनी बाग पर करोड़ों रुपये खर्च कर चुका है। स्मार्ट सिटी के तहत भी यहां म्यूजिकल फाउंटेन और वाटर एटीएम लगाने का प्रस्ताव है। 

Posted By: Abhishek Pandey

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