बरेली, जेएनएन : दीक्षा समारोह में राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और मुख्य अतिथि स्वामी चिदानंद के शिक्षा, पर्यावरण और सेहत पर चिंतन ने एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में बहस छेड़ दी है। वो यह कि रुविवि की वर्तमान व्यवस्था में वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा में कदमताल करने वाले हुनरमंद युवा कैसे तैयार किए जाएं? क्योंकि यहां बीसियों साल पुराना परास्नातक का सिलेबस पढ़ाया जा रहा है, जो देश की प्रतियोगी परीक्षा से प्रतिस्पद्र्धा के लायक नहीं है। पिछले साल राज्य स्तर पर संयुक्त पाठ्यक्रम लागू करने की कसरत हुई। सिलेबस बना। मगर अभी तक लागू नहीं हो सका। अलबत्ता इस साल भी पुराना सिलेबस ही पढ़ाया जा रहा है। भला हो कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का आधुनिक सिलेबस लागू है।

बोर्ड ऑफ स्टडीज की जिम्मेदारी

पाठ्यक्रम संशोधित करने की पहली जिम्मेदारी बोर्ड ऑफ स्टडीज की होती है। बोर्ड के सदस्य मंथन करते। दूसरे विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जा रहे सिलेबस का अध्ययन किया जाता। फिर उसे अपने पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाते। दुर्भाग्य से यहां बोर्ड ऑफ स्टडीज अपनी मूल जिम्मेदारी से कतराती हैं।

मेहनत करनी पड़ेगी इसलिए बचते

बरेली कॉलेज के एक एसोसिएट प्रोफेसर का मानना है कि बोर्ड के समन्वयक काफी अनुभवी शिक्षक बनते हैं, जो शायद थक चुके होते हैं। पाठ्यक्रम अपडेट करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है। फिर नए सिलेबस को पढ़ाने के लिए तैयारी करनी पड़ेगी। इसी कारण अधिकांश शिक्षक सिलेबस में बदलाव से बचते हैं।

नेट में नहीं मिलते 40 फीसद प्रश्न

बरेली कॉलेज में बॉटनी के विभागाध्यक्ष डॉ. अलोक खरे के मुताबिक, करीब 20 साल पहले पीजी का सिलेबस रिवाइज हुआ होगा। विज्ञान में तेजी से बदलाव होते रहते हैं। सिलेबस में बदलाव जरूरी है। इससे विद्यार्थियों को नुकसान हो रहा है। बीस साल पहले की चीजें उन्हें नई लगती हैं। नई चीजें पढऩे को नहीं मिल रहीं। राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा-नेट में हमारे सिलेबस का कुछ ही हिस्सा आता है।

अब भी नहीं पढ़ते हरित राजनीति

बरेली कॉलेज में पॉलिटिकल साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर नीलम गुप्ता के मुताबिक, स्नातक का सिलेबस ठीक है। परास्नातक में बदलाव की जरूरत है। खासतौर से प्राइवेट सिलेबस में। कुछ थ्योरी काफी पुरानी हो चुकी है। समसामयिक मुद्दे, थ्योरी को पाठ्यक्रम में जगह मिलनी चाहिए।

मैथ्स में वायवा की सिफारिश

रुविवि में मैथ्स की बोर्ड ऑफ स्टडीज के समन्वयक डॉ. स्वदेश सिंह सिलेबस से संतुष्ट हैं। उनका तर्क है कि हाल में ही बोर्ड बैठक में एमएससी अंतिम वर्ष में 100 अंक के वायवा की सिफारिश की है। दूसरी विवि में मैथ्स में वायवा है।

रुहेलखंड के रोजगार को नहीं जगह

रुविवि को स्नातक में भी 20 प्रतिशत अपना सिलेबस लागू करने की छूट होती है। वह अपने क्षेत्र के काम धंधे पर रोजगारपरक कोर्स शुरू कर सकती है। बरेली में जरी तो रुहेलखंड में कृषि बड़ा रोजगार क्षेत्र है। कृषि उद्योग से जुड़े शॉर्ट टर्म, डिप्लोमा कोर्स शुरू किए जा सकते हैं। इस संबंध में कार्य नहीं हो रहा।

मुद्दे का चिंतन समझें विद्यार्थी

रुविवि के कुलपति प्रो. अनिल शुक्ल ने कहा कि अभी शिक्षक ज्ञान की रचना नहीं करते, बल्कि उसे परोसते हैं। विद्यार्थियों में चिंतन पैदा करने के बजाय उन्हें सम्मोहित करते हैं। यह शिक्षण नहीं है। पढ़ाई केवल तय सिलेबस तक नहीं होनी चाहिए। विद्यार्थी को जो मुद्दा दिया जाए, उस पर उसका चिंतन समझें। बात करने से नई चीजें निकलेंगी। दूसरा, राज्य स्तर पर सिलेबस तैयार हो चुका है। इसे शासन स्तर से लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। 

Posted By: Abhishek Pandey

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