जागरण संवाददाता, बरेली : बिरयानी मुगलकाल से लेकर अब तक पसंदीदा डिश है तो अक्सर राजनीतिक मुद्दा भी बनती रही। इसके ¨हदुस्तान में आने से लेकर अब तक खाने के शौकीन की तादात लगातार बढ़ी है। वेज और और नॉनवेज दोनों रूप में मौजूद है। मगर कभी आपने सोचा कि भारत में बिरयानी आई कहां से? दरअसल भारत में बिरयानी की आमद मुगलकाल में हुई। बिरयानी पर्शियन भाषा का शब्द है। जिसे उर्दू और ¨हदी दोनों ने अपना लिया है। केवल बिरयानी ही नहीं नॉनवेज व्यंजन में कोरमा, ड्राई फ्रूट में पिस्ता, बादाम जैसे अनगिनत शब्द भी पर्शियन भाषा के हैं, जो अब ¨हदी और उर्दू में घुलकर भारतीयों की जुबान पर चढ़ गए हैं।

ईरान और ¨हदुस्तान की संस्कृति, इतिहास और भाषा में मिठास घोलने के मकसद से ही भारत स्थित ईरानी दूतावास का पर्शियन रिसर्च सेंटर शोध को बढ़ावा देने में जुटा है। मंगलवार को पर्शियन रिसर्च सेंटर के निदेशक डॉ. एहसानुल्लाह शोकरुल्लाही एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय स्थित इंडो-ईरानी सेंटर पहुंचे। पर्शियन भाषा के छात्रों को प्रमाण पत्र सौंपे। पत्रकारों से बातचीत में डॉ. एहसनुल्लाह ने कहा कि भारत-ईरान की संस्कृति एक-दूसरे के बेहद करीब है। दोनों देशों में इतिहास, संस्कृति पर किताबें लिखी जा रही हैं। ये किताबें एक बड़े वर्ग तक नहीं पहुंच पातीं। हम चाहते हैं कि भारत-ईरान के छात्र एक-दूसरे की संस्कृति, इतिहास को जानने के लिए शोध करें। हम उन्हें हर संभव सहयोग देंगे। इंडो-ईरानी केंद्र के प्रभारी प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल ने कहा कि यह खुशी की बात है कि दोनों देशों सांस्कृतिक, ऐतिहासिक शोध शिक्षा के लिए प्रयासरत है। विद्यार्थियों को इससे एक-दूसरे की संस्कृति जानने का मौका मिलेगा।

1837 तक बोली जाती रही पर्शियन

भारत में सन 1837 तक पर्शियन भाषा बोली जाती रही। ईरानी एम्बेसी से आए अली रजा बताते हैं कि अंग्रेजी दौर में पर्शियन भाषा धीरे-धीरे खत्म होती गई। ¨हदी-उर्दू ने इसके शब्दों को जिंदा रखा, जो अब भारतीय भाषा का हिस्सा बन गए हैं।

ऑडियो-वीडियो से सीखें पर्शियन

पर्सियन कोर्स के छात्र-छात्राओं को निश्शुल्क किताबों के साथ ऑडियो-वीडियो की सीडी भी दी गई। जिससे वह पर्शियन सीख सकते हैं। प्रोफेसर श्याम बिहारी लाल ने कहा कि भाषा सीखकर विद्यार्थी बड़े स्तर पर काम कर सकते हैं।

Posted By: Jagran

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