बरेली, जेएनएन। Mishap in Badaun : स्कूल नहीं गया मगर, 10 वर्ष के शिवम को बलिदानी भगत सिंह के बारे में खूब पता था। स्वजन से सुनी क्रांतिकारियों की कहानियों को जीवंत अभिनय में उतारने के लिए वह बुधवार को दोस्तों की टोली में शामिल हो गया। बलिदानी भगत सिंह नाटक का रिहर्सल करते हुए फंदे पर लटकने का अभिनय करना था मगर, क्रूर काल को कुछ और ही मंजूर था। वह सांकेतिक रूप से नहीं, बल्कि वास्तव में फंदे पर झूल गया। छटपटाया, सामने खड़े साथियों को हाथ से इशारा भी किया मगर, वे नादान समझ नहीं सके। गुरुवार दोपहर को चंद मिनट में शिवम की जान चली गई।

कुंवरगांव के गांव बावट में रहने वाले भूरे और आरती खेतों में मजदूरी करते हैं।परिवार का माहौल कहें या आर्थिक दुश्वारी, एकलौते बेटे शिवम को वे स्कूल नहीं भेज सके थे। ज्यादातर वक्त वह अपनी नानी के घर में रहता था।पिछले महीने वह मां, पिता के घर आया, उसके बाद नानी के यहां नहीं गया था। गांव के ही हमउम्र बच्चों से उसकी दोस्ती हो गई थी।

दोस्तों से कहा, मैं बनूंगा भगत सिंह

गुरुवार को मां, पिता खेत पर काम करने गए थे। दोपहर करीब दो बजे शिवम के छह दोस्त उसके घर पहुंचे। वे स्कूल की कहानियां सुनाने लगे। बताया कि 15 अगस्त को नाटक मंचन होता है। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद की कहानियां सुनाई जाती हैं। शिवम ने झट से कहा, भगत सिंह के बारे में मुझे भी पता है। अन्य बच्चों ने कहा कि 15 अगस्त के लिए नाटक का रिहर्सल करते हैं, जोकि हमारे स्कूल में काम आएगा। शिवम भले ही स्कूल नहीं जाता था मगर, नाटक मंचन में साथ हो गया। बोला, भगत सिंह मैं ही बनूंगा।

इंकलाब के नारे लगे और फंदे पर झूल गया। साथी बच्चों ने बताया कि वे सब नाटक मंचन करते हुए इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे।इतने में शिवम घर में रखी रस्सी तलाश लाया। एक सिरा दरवाजे पर बांधा, दूसरे का फंदा बना लिया। इसके बाद उसने भी नारा लगाया और फंदा अपने गले में फंसा लिया। उसे नीचे रखे स्टूल पर ही पैर रखने थे मगर, अचानक वह हाथ-पैर इधर-उधर फेंकने लगा इससे स्टूल छिटककर दूर जा गिरा। उस समय लगा कि वह अभिनय कर रहा। 

Edited By: Ravi Mishra