बरेली, जेएनएन। वैभव अग्रवाल उन लोगों में से हैं जिन्होंने नौकरी छोड़कर बिजनेस किया और सफलता की कहानी लिखी। आज उनका व्यापार न सिर्फ आठ से ज्यादा जिलों में फैला है बल्कि वह एक पैरामेडिकल साइंसेज का इंस्टीट्यूट का भी संचालन कर रहे हैं। वैभव से उनकी सफलता की कहानी पूछते ही वह अतीत की यादों में खो जाते है और लंबी सांस लेते हुए कहते हैं कि मैं 2008 को एमबीए करने के बाद नौकरी करने के लिए गुड़गांव चला गया था। पहले से ही पिताजी की साबुन की फैक्ट्री थी। इसलिए थोड़ा बिजनेस का अनुभव था और मन का झुकाव भी था लेकिन एमबीए किया तो सोंचा नौकरी कर लूं।

एक दिन अचानक मम्मी का फोन आया कि वैभव तुम भी चले गए। अब हम अकेले रह गए हैं। भैय्या तो पहले से ही जॉब कर रहे हैं। मैंने तुरंत ही दूसरे दिन सामान पैक किया और घर आ गया। थोड़े दिन पापा का साबुन फैक्टी में हाथ बंटाया लेकिन मैं कुछ और करना चाहता था। इसलिए मेरे दिमाग में आया कि आदमी की सबसे बड़ी जरुरत होती है रोटी कपड़ा और मकान। मैंने मकान को चुना। सोचा कि आदमी मकान बनाता है तो फिर उसे मेनटेन भी करता है और फिर मैंने गद्दे फोम से संबधित उत्पाद का थोक का व्यापार शुरु किया। देखते देखते व्यापार चल निकला।

इसके बाद फिर हमने एक इंस्टीट्यूट खोला जो कि पैरामेडिकल साइंसेज का है। वह भी मैं देखता हूं। बाद में मेरी पत्नी अदिति अग्रवाल और मैंने सोंचा कि क्यों न हम मकान की सजावट वाली चीजों की रेंज को विस्तार दें और इसका रिटेल में व्यापार करें। हमने 2018 में इंटीरियर का रिटेल में बिजनेस शुरु किया। इसके लिए हमने मॉडल टाउन चौकी के सामने शोरूम खोलने के लिए जगह खरीदी और फिर हमने बड़े स्तर पर इंटीरियर फर्नीचर का काम शुरु किया। आज हम करीब आठ से ज्यादा जिलों में व्यापार कर रहे हैं। आने वाले दिनों में हम होम फर्नीशिंग के काम पर फोकस करेंगे। इसमें हम मेट्रों शहरों में फोकस करेंगे साथ ही बरेली के लोगों को गुणवत्ता युक्त इंटीरियर का सामान उपलब्ध कराएंगे जो अभी बाहर से लोग खरीदते हैं।

 

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