बरेली, जेएनएन। जिस वक्त संक्रमित हो जाने पर स्वजन ही साथ छोड़ रहे थे। उस वक्त इन बेसहारों का सहारा सिर्फ और सिर्फ चिकित्सक ही थे। जो उन्हें एक नई जिंदगी दे रहे थे। वर्तमान में 300 बेड अस्पताल में सेवा दे रहीं पूजा भोरा भी इस कड़ी में शामिल रहीं और आज भी डटी हुई हैं। जिन्होंने पूरे मनोयोग से संक्रमितों का रात-दिन इलाज कर उन्हें कभी अकेलेपन महसूस नहीं होने दिया।

पूजा भोरा पिथौरागढ़ की मूल निवासी हैं। बताया कि वह वर्ष 2019 से श्रीराम मूर्ति स्मारक मेडिकल कॉलेज में स्टाफ नर्स के पद पर तैनात हैं। वर्ष 2020, मार्च माह में जब संक्रमितों की संख्या बढ़नी शुरू हुई तो पूजा को भी अपनी सेवा देने का मौका मिला। बताया कि इस दौरान कई लोगों ने ड्यूटी करने से इंकार भी किया। उन्होंने ने जब अपनी मां से घर वापस लौट आने की बात की तो मां ने कहा कि यह अवसर तुम्हें भगवान ने दिया है। उन्हीं की भक्ति समझ कर तुम्हें अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करना है। बताती हैं कि मां हर दिन फोन पर बात कर हौंसला बढ़ाती रहती थीं। उन्हीं की सीख थी कि वह रात-दिन संक्रमितों के साथ खड़ी रहीं और उन्हें अकेला न होने का एहसास कराते हुए उनका मनोबल बढ़ाती रहीं।

नौ महीने घर नहीं गई थीं पूजा

पूजा ने बताया कि मार्च माह से लगातार संक्रमितों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही थी। कुछ महीनों बाद मन में आया कि एक बार घर होकर आ जाऊं। लेकिन हर बार मां की सीख उन्हें अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराती रहीं। बताया कि दिसंबर आते-आते जब संक्रमितों की संख्या कम होनी शुरू हुई तब उन्होंने घर का रूख किया।

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