शााहजहांपुर,[नरेंद्र यादव]। प्रकृति प्रेम का जुनून कृषक कवि चंद्रपाल सिंह की पहचान बन गया। बीस वर्ष पूर्व इकलौटे बेटे के जीवन में मंगल के लिए उन्होंने १५ बीघा में जंगल लगाया। तब कमाई के बजाय उद्देश्य था पुरखों के नाम और पर्यावरण संरक्षण का। लोगों के उपहास को जवाब देने के लिए उन्होंने जंगल को समरसता, सेहत और समृद्धि का प्रतीक बना दिया। अब वह फल और जड़ी-बूटियों से लोगों की भलाई के साथ प्रतिवर्ष करीब पांच लाख की कमाई भी कर रहे हैं।

वन विभाग कार्मिक मित्र की सलाह पर शाहजहांपुर, उप्र की जलालाबाद तहसील स्थित गांव गुरुगवां निवासी चंद्रपाल सिंह ने गांव से एक किमी दूर स्थित खेत में उजाड़ होने पर कृषि वानिकी का सहारा लिया। एक हेक्टेयर में करीब सौ प्रजातियों के पौधे लगाए। खेत के किनारे करौंदा, बीच में गिलोय की पौध लगा दी। वर्तमान में रस्सीनुमा सैकड़ों क्विंटल गिलोय जैविक बाड़ के रूप में जंगल की रक्षा के साथ लोगों को सेहत संवार रही है।

२०० सागौन के बड़े पेड़ तैयार हैं, ३०० सगौन के छोटे पेड़ हैं। २० लीची, पांच लौंग, ३० ग्रिवेलिया, ४० पुत्रंजीवा, ३०० नीम का गिलोय बौंड़ी हैं। ६ अनार, ८ बेल, ५ आंवला, ७० करौंदा, १० नीबूं के ५० छोटे पेड़ हैं। पेड़ों के बीच बूट, हल्दी, जमीकंद की खेती हो रही है। ककड़ी, खीरा, तोरई हरी मिर्च, केला की खेत से भी चंद्रपाल प्रतिवर्ष अच्छी कमाई कर लेते हैं।

चंद्रपाल ने जंगल में रोसा और लेमन ग्रास भी लगाई है। औषधीय गुणों वाली इस घास से प्रतिवर्ष एक से ड़ेढ लाख का तेल निकलवाकर बेचते हैं। क्षेत्र के तमाम लोग जंगल से गिलोय समेत जड़ी बूटी निश्शुल्क ही ले जाते हैं। कोरोना से बचाव के लिए बड़ी संख्या में लोग काढ़ा के लिए नीम की गिलोय ले गए। कोरोना काल में तो यह जंगल ग्रामीणों के लिए भी मददगार साबित हुआ।

चंद्रपाल कहते हैं कि मुनाफा सबकुछ नहीं है। मैंने इसके लिए नहीं, बल्कि औषधीय लाभ प्रत्येक तक पहुंचे, इसलएि जड़ी-बूटयिां लगाईं। संतोष है कि गांव के लोगों की मदद कर पा रहा हूं। कल्पवन के बाद अब चंद्रपाल ने औषधीय वन का सपना संजोया है। इसके लिए उस बीघा खेत सुरक्षित कर लिया। इसमें आंवला, हर्र, बहेड़ा, सहजन, अश्वगंधा, मूसली, शतावर आदि की औषधीय वन का योजना है।

बुरे पौधों को बना दिया अच्छों का चौकीदार

कवि हृदय किसान चंद्रपाल ने बुरे पौधों को जंगल में पूरी तरजीह दी। बताया कि जिस भटहर को बुरा पौधा कहा जाता है, उसकी वजह से ककड़ी, तोरई, बूट में कीड़े नहीं लगते। उन्होंने बुरे पौधों की महत्ता इस इस कविता से समझाने की कोशिश की.. सदुपयोग होने से से अकसर, बुरे बुराई भी खोते हैं, दुरुपयोग करते जो जन हैं, बिलख-बिलख ही रोते हैं। हास्यास्पद ही होगा सीमापर फूलों का लग जाना, सीमाओं पर सदा शुशोभित कंटक ही होते हैं..।

 

Posted By: Ravi Mishra

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