बरेली, जेएनएन। Dainik Jagran Sanskarshala : आयुष अपने घर के बाहर खड़ा था। इम्तिहान खत्म हो गए थे। सारे दोस्त कहीं न कहीं घूमने चले गए थे, लेकिन पापा ने कहा था कि जब तक कोरोना पूरी तरह से खत्म न हो जाए, हम कहीं नहीं जाएंगे। कहीं गए तो या तो किसी को संक्रमित करेंगे या किसी से संक्रमित होंगे। जब तक जरूरी न हो, बाहर नहीं निकलेंगे। राजकीय कन्या इंटर कालेज में गुरुवार को छात्रों को दैनिक जागरण के संस्कारशाला में सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान शीर्षक से प्रकाशित कहानी सुनाई गई।

शिक्षक ने कहा कि आयुष को बुरा लगा था, लेकिन पापा की बात तो माननी ही थी। वह सामने लगे बड़ के पेड़ पर बैठे कोतवाल पक्षी के जोड़े को देख रहा था और उसके नाम के बारे में सोचकर मुस्कुरा रहा था। कोतवाल पक्षी की पहचान भी दादा जी ने उसे कराई थी। पक्षी की पूंछ में वी का निशान है तो वह कोतवाल है। तभी सामने वाली पिंकी आंटी ने आवाज लगाकर पूछा- आयुष तुम्हारी मम्मी घर पर हैं। उसके हां कहने पर वह घर के अंदर आ गईं। कहने लगीं- अरे बहन जी, अभी तक आपने यह पुराना वाला कंप्यूटर बदला नहीं। इतना बड़ा डब्बा-सा कैसा बुरा लगता है।

सुनकर पिंकी आंटी बोलीं- आजकल तो हर तीन महीने में कंप्यूटर बदल जाते हैं। टिन्नी को तो बस यही शौक है। हर दूसरे दिन मोबाइल और लैपटाप बदलना। मम्मी के साथ गप्पे लड़ाकर पिंकी आंटी तो चली गईं, मगर आयुष परेशान हो गया। टिन्नी के पापा और आयुष के पापा एक ही दफ्तर में थे। तब ऐसा क्यों कि टिन्नी की हर जरूरत पूरी हो सकती थी और फिजूल खर्ची भी। दूसरी तरफ आयुष के पापा और मम्मी अब तक किसी चीज को नहीं फेंकते थे, जब तक वह काम आती। कोई नई चीज तब आती जब पुरानी चीज पूरी तरह से खराब न हो जाए।

पापा अक्सर मशहूर उद्योगपति फोर्ड का किस्सा सुनाते थे, जो एक फटे कोट को ही पहनते थे। एक बार वह विदेश जा रहे थे, तो उनके सहायक ने कहा कि कम से कम नया कोट ले लें। तब फोर्ड ने उत्तर दिया कि जो लोग मुझे जानते हैं, उन्हें मेरे फटे कोट से कोई फर्क नहीं पड़ता। जो नहीं जानते उन्हें इससे मतलब क्या। कहा कि ईमानदारी से कोई भी जंग जीती और दूसरो को जिताई जा सकती है। हम सब अपने-अपने हिस्से की ईमानदारी दिखाएं, सरकारी ही क्या किसी भी ऐसी सुविधा को खराब होने से रोंके तो इससे देश का बहुत सा खर्च बच सकता है। उस पैसे को जरूरतमंदों को दिया जा सकता है।

क्या बोलीं छात्राएंः छात्रा खुशी ने बताया कि कहानी से सीख मिली कि दिखावे की जिंदगी हमेशा इंसान से दुखी और बचत कर इंसान हमेशा सुखी रहता है। अंशिका पाठक ने बताया कि कई बार बहुत सी बातें देखकर नहीं कहानी सुनकर समझ आती हैं। मैंनें अब संस्कारशाला की कहानी से दिखावा न करने की सीख ली है। राधिका खन्ना का कहना है कि कुछ न कुछ सीखाने के लिए दैनिक जागरण की ओर से समय-समय पर प्रयास होता रहता है। खुशी सिंह का कहना है कि कहानी सुनकर सीख मिली कि दूसरों की जिंदगी पर गौर न कर सादा जीवन उच्च विचार को ध्यान में रख आगे बढ़ते रहें। 

Edited By: Samanvay Pandey