वसीम अख्तर, बरेली : साइकिल वाली पार्टी में महानगर अध्यक्ष की ताजपोशी होनी है। आलम एक अनार, चार बीमार वाला है। इनमें एक बुजुर्गवार भी हैं। वह कुर्सी पर पहले बैठाए जा चुके हैं। दावेदार अपना माहौल बनाने के लिए लखनऊ की दौड़ लगा रहे हैं। एक होकर आता है तो दूसरा, तीसरा और फिर चौथा पीछे से पहुंच जाता है। पिछले दिनों एक दावेदार पैरवी कराने के लिए एक मोहतबर शख्सियत को साथ ले गए। जैसे ही खबर बुजुर्गवार के कानों तक पहुंची, अगले दिन राजधानी को ट्रेन पकड़ ली। कुर्सी को लेकर उनकी इस जद्दोजहद पर मुखालिफ खूब तंज कस रहे हैं कि जमीन पर पैर सीधे नहीं पड़ रहे और कुर्सी की तमन्ना लिए घूम रहे। जवाब देने में बुजुर्गवार के हिमायती भी देर नहीं लगा रहे। एक दिवंगत नेता का नाम लेते हुए कहते हैं कि जब वह आखिरी सांस तक अध्यक्ष रहे तो फिर मास्साब क्यों नहीं। 

ट्रस्ट पर हल्ला

आम-ओ-खास के बीच जब जिक्र आता है तो उनका नाम बुद्धिमानी के लिए लिया जाता है। इसी वर्ग से आने वाले चंद लोगों ने एक अच्छे काम बीड़ा उठाया। एक भवन बनाकर उसमें गरीब बेटियों की शादी का लक्ष्य तय किया। उसे पूरा करने के लिए एक समिति बनने की बात तय हुई लेकिन बना ट्रस्ट लिया। उसमें एक राष्ट्रीय पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष, एक रिटायर्ड अफसर और आचार्य पदासीन हुए। 11-11 हजार के 340 मेम्बर बन गए। थोड़े ही प्रयास से 39 लाख रुपये इकट्ठा हो गए। पैसा देने वालों में कुछ ज्यादा दिमागदार ट्रस्ट की तह तक पहुंच गए। भेद खुल गया कि अध्यक्ष की व्यवस्था आजीवन है। इल्जाम लगने लगे कि पैसा खाने की तैयारी है। ट्रस्ट

को बदलने की मांग उठ रही है लेकिन तीन मीटिंग के बाद भी बदला नहीं गया। मेम्बर चंदा वापस मांग रहे

हैं और सोशल मीडिया पर कमेंट डाल रहे हैं।

अरमान दबाए बैठे

दो महीने पहले खिले दिखने वाले भाजपा के एक युवा नेता का चेहरा कुम्हला गया। जब से पार्टी के दो

जिलाध्यक्ष बनाए जाने का फैसला हुआ, तब से आंवला-बरेली क्षेत्र के दो युवा नेता बड़े आत्मविश्वास में थे।

इस उम्मीद के साथ कि आने वाला वक्त उनका है। पार्टी में जिले की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठने के सपने

देखने के साथ इस आस के दावों की मजबूती भी बताते थे। दोनों एक ही चुनावी पाठशाला में पढ़े थे इसलिए

बात में दम मान ली गई। पर्चे भरे, फाइलों के जरिये लखनऊ पहुंच गए। वहां से जब छंटनी होकर महज दो

कागज आए तो आंवला वाले नेताजी के पैरों से जमीन खिसक गई। एक कागज में बरेली वालों का नाम दावों

की कसौटी पर खरा उतरा मगर आंवला वाले दावेदार के सपने चकनाचूर हो गए। अब मैदान में कम दिखते

हैं। चर्चा है कि अरमान सीने में दबाए बैठे हैं।

खिसक लिए नेताजी

उन पर इल्जाम है कि पहले भी मीटिंग में बदजुबानी करते रहे हैं। पिछले दिनों एक और मामला सामने आया। भरी मीटिंग में पार्टी के बड़े पद वालों बहुत कुछ कह दिया। बुरा तो सभी को लगा लेकिन शिक्षा विभाग से जुड़े नेताजी को खामोश कर मीटिंग से बाहर निकाल दिया गया। बाद में जब मीटिंग खत्म हुई तो जिनकी शान में गुस्ताखी हुई थी, वह पदाधिकारी बुरी तरह भड़क गए। अन्य पदाधिकारियों से कहा, अब बुलाकर लाओ, देखता हूं, कितना बड़ा दादा है। उन्हें गुस्से में देख उनके गनर हरकत में आ गए। गन तान ली।पीलीभीत बाईपास स्थित कार्यालय में बदजुबानी करने वाले नेताजी की तलाश की गई। गनीमत रही कि नेताजी को उनका हित चाहने वालों ने पहले ही रफूचक्कर करा दिया था। बताने वाले बता रहे हैं कि अगर नेताजी मीटिंग के बाद रुके होते तो फिर वह दोबारा किसी गुस्ताखी के काबिल नहीं रह पाते।

 

Posted By: Abhishek Pandey

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