बरेली, जेएनएन। Tigress caught in Bareilly : बाघिन तक पहुंचने के लिए सेंसर कैमरों के साथ ही पीआइपी (पग मार्क इंप्रेशन पैड) अहम रहे। रबर फैक्ट्री परिसर में 39 कैमरे लगाए गए थे, जिनमें 11 वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट आफ इंडिया के और पीलीभीत टाइगर रिजर्व के नौ व शेष वन विभाग के कैमरों के जरिये रोजाना बाघिन की निगरानी होती थी। गुरुवार की सुबह टीम को सटीक लोकेशन मिली, जिसके बाद रेस्क्यू शुरू कर दिया गया।

तड़के ठिकाना तलाशा : बाघिन रात भर टहलकर तड़के ठिकाना तलाश लेती थी। यह बात वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट की टीम को भी पता थी। यही वजह थी कि टीम के सदस्य सुशांत कुमार रोजाना तड़के सेंसर कैमरे देखने पहुंचे थे। गुरुवार सुबह करीब 5 बजे उन्होंने कैमरा नंबर 29 की चिप निकालकर चेक की तो पता चला कि कुछ देर पहले ही बाघिन चूना कोठी की ओर से टैंक की ओर गई है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के विशेषज्ञों की सहायता से पगमार्क के जरिए भी लोकेशन मिलती जा रही थी। वहीं कैमरा नंबर 34 और 33 में क्रमबद्ध तस्वीरें दिखती गईं। जिससे मालूम हो गया कि बाघिन टैंक में ही छिपकर बैठी है।

पांच बजे सुबह मिल गए पक्के साक्ष्य : कैमरों में मिली बाघिन की तस्वीरें इस बात को प्रमाणित कर रही थीं कि वह चूना कोठी से कोयला प्लांट फिर टैंक की ओर गई थी। इसी जानकारी के आधार पर सुशांत पीछा करते हुए खाली टैंक के करीब पहुंच गए।टैंक के चारों ओर निगाह दौड़ा रहे सुशांत ने देखा कि दो टैंक के बीच खाली पड़ी जगह में अंधेरे में बाघिन ने ठिकाना बना लिया है। टैंक के प्रवेश द्वार को बंद करके वह विशेषज्ञों के साथ टैंक के ऊपर चढ़े, जहां उन्हें दो टैंकों के बीच में बाघिन लेटे दिखाई दी। वह दबे पांव वहां से लौटे और टीम के सदस्यों व उच्च अधिकारियों को इसकी जानकारी दी।

6:30 बजे चारों ओर लगाया गया जाल : जाल आदि की व्यवस्था रबर फैक्ट्री में पहले ही कर ली गई थी। जिससे टैंक के साथ ही आसपास के एरिया को कवर किया गया। इसके बाद टीम इंतजार करने लगी कि बाघिन बाहर निकले, ताकि वह जाल में फंस जाए।बाघिन बाहर निकलकर जाल में फंसेगी, इसके बाद ट्रैंक्युलाइज किया जाएगा। इसके लिए डब्ल्यूटीआइ के साथ ही पीलीभीत टाइगर रिजर्व के विशेषज्ञ भी मौके पर थे। सात बजे पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर जावेद अख्तर, डीएफओ भारत लाल के साथ सभी रेंजर मौके पर पहुंच गए। 7.30 बजे मुख्य वन संरक्षक ललित कुमार भी मौके पर पहुंच गए।

पल-पल की जानकारी लेते रहे लखनऊ से अधिकारी : प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव पवन कुमार शर्मा रबर फैक्ट्री मेें हो रहे आपरेशन टाइगर की पल-पल जानकारी ले रहे थे। आपरेशन में टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी के नियमों का पालन करते हुए चलाया जा रहा था। लखनऊ से ट्रैंक्युलाइज होने की अनुमति नहीं मिली, ऐसे में टीम बाघिन के बाहर निकलने का इंतजार करने लगी। एक ही जरिया था कि वह बाहर निकले और जाल में फंस जाए। जिसके बाद उसे पिंजरे में बंदकर उसे वापस किशनपुरी के जंगलों में छोड़ना तय हुआ।

पिंजरे में बांधा गया है पड्डा : वन्यजीव विशेषज्ञों ने टैंक के बाहर सटाकर लगाए गए पिंजरे में पड्डा को बांधा गया है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर व वन संरक्षक जावेद अख्तर ने बताया कि बुधवार को हुई बैठक में ही बाघिन की लोकेशन लगभग तय हो गई थी। डब्ल्यूटीआइ के विशेषज्ञ व पीलीभीत टाइगर रिजर्व के विशेषज्ञों ने सेंसर कैमरों में फोटो देखने के साथ ही बाघिन के पगमार्क को देख टैंक में बाघिन को प्रवेश करने की पुष्टि कर ली थी।

दो दिन बाद बंद एक बार फिर बंद होना था आपरेशन टाइगर : 29 मई से छठी बार शुरू हुआ आपरेशन टाइगर 19 जून से बारिश होने के चलते बंद किया जाना था। इसके लिए वन विभाग के अधिकारियों ने भी तैयारी कर ली थी। प्रभागीय वन अधिकारी भारत लाल ने बताया कि डब्ल्यूटीआइ के विशेषज्ञ सुशांत की मेहनत के चलते बाघिन को एक निश्चित जगह ट्रेस करने में सफलता मिली।

Edited By: Samanvay Pandey