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बरेली [वसीम अख्तर] :रुहेलखंड की धरती पर कई ऐसे रचनाकार हुए जिन्होंने हिंदी को नए आयाम दिए। पुराने दौर की बात करें तो पं. राधेश्याम कथावाचक हों या फिर रामजी शरण सक्सेना, द्विजेंद्र नाथ, निरंकार देव सेवक, इनका योगदान भुलाया नहीं जा सकता लेकिन शहर में इन्हें गुमनाम कर दिया गया। और तो और मुंशी प्रेमचंद के नाम पर भी कोई यादगार कायम नहीं हो सकी, तब जबकि वह दो मर्तबा यहां आए। यह कहना है साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी का। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस तरह की सोच को आगे रखकर हिंदी का उत्थान नहीं किया जा सकता।

सवाल : हिंदी के उत्थान को लेकर बातें खूब हो रही हैं लेकिन बुनियादी काम नहीं दिख रहे। क्या होना चाहिए जिससे भाषा को वास्तव में बढ़ावा मिल सके?

जवाब : पहले तो अफसोस के साथ कहूंगा कि रुहेलखंड जैसे हिंदी के समृद्ध क्षेत्र में हिंदी विभाग यूनिवर्सिटी कैंपस में नहीं है। सुदूर कहे जाने वाले केरल जाना हुआ तो वहां त्रिवेंद्रम की यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग स्थापित है। यहां एक शिक्षक इसके लिए एक लाख रुपये दे रहे थे कि शुरूआत कीजिए लेकिन जिम्मेदार तैयार नहीं हुए।

सवाल : युवाओं को हिंदी भाषा के लिए प्रेरित करने के लिए और क्या किए जाने की जरूरत है?

जवाब : ऐसे काम जिनसे उन्हें प्रेरणा मिले। उदाहरण के तौर पर जिले ने कई नामवर रचनाकार दिए हैं। उनके नाम और साहित्य के क्षेत्र में किए गए काम से युवा पीढ़ी को परिचित कराना होगा। उनके नाम पर यादगार कायम करना होगी। इसके लिए जंक्शन का इस्तेमाल किया जा सकता है। उस पर साहित्यकारों के साथ स्वतंत्र संग्राम सेनानियों के फोटो लगाए जा सकते हैं।

सवाल : रुहेलखंड यूनिवर्सिटी और रेलवे ने ऐसा किया तो है?

जवाब : हां, यूनिवर्सिटी ने पंडित राधेश्याम कथावाचक के नाम पर पीठ स्थापित की लेकिन बोर्ड पर उनका अधूरा नाम लिखा। इसी तरह रेलवे ने जंक्शन पर टिकटघर के पास हिंदी पुस्तकालय का नाम शकील बदायूंनी पर रख दिया। हम शकील बदायूंनी का आदर करते हैं लेकिन हिंदी पुस्तकालय का नाम उन पर नहीं होना चाहिए था। 

Posted By: Abhishek Pandey

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