अ‍भ‍िषेक मिश्र, बरेली : बाकरगंज वालों का दर्द ऐसा है जिसे पीढिय़ां भुगत रहीं। कूड़े के पहाड़ के बीच उनकी जिंदगी किस तरह बसर हो रही, यह मुश्किल सिर्फ वही महसूस कर सकते हैं। सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट बनाने के दावे जितनी बार उठते हैं, उनके मन में हर बार नई उम्मीद जगती है। वे आस भरी नजरों से देखते हैं, फिर निराश हो जाते हैं। पिछले दिनों नए नगर आयुक्त आए तो लगा कि सालों पुराने इस नासूर को खत्म करने का कुछ फाहा लगाएंगे मगर वे अब तक इस पर कुछ बोले नहीं हैं। बाकरगंज वालों को इंतजार है, बारिश के दिनों में फैलने वाली बीमारियों से बच्चों को बचाने वाले इंतजाम का। तेज बदबू से निजात का। हालात ऐसे बन गए हैं कि वहां रहने वाले लड़कों की शादी के लिए दूसरे शहर से लोग नहीं आते। मुहल्ले में रहने वाले कहते हैं, आखिर कब खत्म होगी कूड़े वाली बदरंग पहचान।

सिर्फ योजना से स्मार्ट

एक तो रास्ते पहले ही संकरे थे, अब आए दिन बढ़ते जा रहे अवैध पार्किंग स्थल नई मुसीबत हैं। शोरूम, अस्पताल, बैंक और न जाने कितने संस्थानों की इमारतें तो ऊंची-ऊंची बन गईं मगर गाडिय़ां कहां खड़ी होंगी, इससे सरोकार नहीं। वहां आने वालों ने गाड़ी खड़ी की, और खिसक लिए। इसके बाद चाहें एंबुलेंस फंसे या स्कूल बस। ट्रैफिक पुलिस अगर ऐसे वाहनों को उठाकर ले जाए तो हल्ला करने वाले कम नहीं हैं। बीडीए, नगर निगम चुप्पी साधे है। अब यहां सवाल यह भी उठता है कि क्या व्यवस्था बनाना सिर्फ इन्हीं विभागों का जिम्मा है? तो फिर सिविक सेंस क्या चीज है? शहर के प्रति हमारी कोई जिम्मेदारी बनती है? असल मायने में हम अपनी तरफ से कोशिश ही नहीं करते। शहर को सिर्फ स्मार्ट सिटी योजना से ही स्मार्ट बनाने के सपने देख रहे हैं। मगर, बिना स्मार्ट सिटीजन क्या कोई शहर स्मार्ट हो सकता है?

रेल लाइन हमारी जागीर

शहर के बीचोबीच शाहदाना से पुरानी रेल लाइन गुजरती है। इस पर सालों से ट्रेन नहीं चलती इसलिए बेकार पड़ी है। बेकार पड़ी इस जमीन पर कुछ प्रोजेक्ट प्रस्तावित किए गए मगर बात आगे नहीं बन सकी। जब अफसरों को ही सुध नहीं तो वहां आसपास रहने वालों ने इस जमीन पर अपने पैर पसार लिए। किसी ने गैराज बना लिया तो किसी ने कबाड़खाने का स्टोर। जुआरियों का अड्डा तो पहले से है ही। रेलवे अधिकारियों के पास यहां तीन स्टेशन हैं। वे उन्हीं से बाहर नहीं निकल पा रहे। कभी निर्माण कार्य तो कभी टिकटों की गिनती में उलझे रहते हैं। इस पुरानी बेशकीमती जमीन के बारे में वे तभी सोचते हैं जब कोई जनप्रतिनिधि टोक दे। कुछ दिन सर्वे, फाइलें आगे खिसकती हैं इसके बाद सब ठंडा। रेल अफसर भी जान चुके हैं कि किस बात का शिगूफा कितने दिन चलाकर नौकरी बदस्तूर चलाई जा सकती है।

जुगाड़ वाहन से बचकर

ई रिक्शा जब चलने शुरू हुए तो रजिस्ट्रेशन को लेकर तमाम सवाल उठे थे। इससे इतर अब नए प्रयोग देख लें। हल्का लोड ढोने वाली ठेली में गजब का जुगाड़ किया गया। पुराने स्कूटर या बाइक में इन ठेलियों को फिट कर लिया गया। चीनी की बोरी हो या आटे की, इस ठेली पर रखीं और आगे लगी पुरानी बाइक से इसे सरपट दौड़ाया जा रहा। यहां तक तो ठीक है मगर सवाल इस बात का है कि जुगाड़ लो वाहन में न ब्रेक लगने की जिम्मेदारी है और न बैलेंस बनाए रखने की। कब कहां भिड़ जाएं और कब पलट जाएं, कुछ पता नहीं। मॉडल टाउन में जगविंदर और परविंदर कहते हैं, चलाने वालों के लिए तो यह ठीक है। उन्हें पैरों से ठेली नहीं खींचनी होती मगर फिक्र उनकी भी करनी होगी जोकि सड़क पर पैदल चलते हैं। कब ये वाहन हादसे की वजह बन जाएं, पता नहीं। 

www.jagran.com/uttar-pradesh/bareilly-city-youths-of-jammu-and-bihar-participated-in-azad-inter-college-demonstration-police-is-collecting-all-information-19943869.html

Posted By: Abhishek Pandey

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