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    UP News: 32 साल बाद धुला दहेज हत्या का दाग, कोर्ट ने किया बरी; नहीं साबित हो सका आरोप

    Updated: Sun, 23 Feb 2025 03:25 PM (IST)

    UP News 32 साल बाद दहेज हत्या के आरोप से शिव गोविंद त्रिपाठी को कोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकरण में कोई भी स्वतंत्र तथ्य का साक्षी नहीं है। ऐसे में शिव गोविंद पर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं होते हैं। वादी की ओर से पंजीकृत कराया गया मुकदमा एवं घटनाक्रम असत्य प्रतीत होता है।

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    कोर्ट ने 32 साल बाद किया दोषमुक्त। जागरण

    जागरण संवाददादता, बरेली। दहेज हत्या के आरोप में फंसे शिव गोविंद त्रिपाठी 32 वर्ष बाद दोषमुक्त हो सके। शनिवार को अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम) रवि कुमार दिवाकर ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बरी करते कर दिया। कोर्ट में सिद्ध हुआ कि शिव गोविंद की पत्नी निर्मला देवी की हत्या नहीं की गई, बल्कि उन्होंने आत्मदाह किया था। वह अपनी बहन की आत्महत्या के बाद से तनावग्रस्त थीं।

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    कैंट में रहने वाले सैन्य कर्मी शिव गोविंद त्रिपाठी की शादी 23 अप्रैल 1992 को कानपुर निवासी निर्मला से हुई थी। 13 मार्च 1993 को निर्मला की जलने से मौत हो गई थी। इसकी सूचना पर शहर आए निर्मला के पिता कृष्णकांत ने मुकदमा पंजीकृत कराया था।

    उनका आरोप था कि दहेज में स्कूटर, सोने की चेन नहीं देने पर शिव गोविंद ने निर्मला को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। विरोध करने पर निर्मला की जलाकर हत्या कर दी गई। इस प्रकरण में निर्मला के मृत्यु पूर्व दिए गए बयानों को पुलिस ने अपनी विवेचना में गंभीरता से शामिल नहीं किया।

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    पुलिस ने दिखाई थी लापरवाही।- जागरण


    उन्होंने बयान दिए थे कि अपनी बहन की आत्महत्या से आहत हैं, इसलिए खुद भी आग लगा ली। इस बयान की अनदेखी कर शिव गोविंद को आरोपित बनाकर जेल भेज दिया, बाद में जमानत मिल सकी। इस बीच पुलिस ने चार्जशीट में भी ढिलाई की। घटना के 18 वर्ष बाद कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की जा सकी।

    इसके बाद सुनवाई शुरू हुई तो सिर्फ गवाह पेश किए गए। इनमें निर्मला की माता शारदा देवी और अस्पताल के चिकित्सक सुनील कुमार शामिल थे। शारदा ने बयान दिया था कि 13 मार्च 1993 को शिव गोविंद उनकी बेटी निर्मला की विदा कराकर लाए। उसी दिन जलाकर मार डाला।

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    पोस्टमार्टम रिपोर्ट में निर्मला के जलने एवं आघात से मृत्यु का उल्लेख था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि इस प्रकरण में कोई भी स्वतंत्र तथ्य का साक्षी नहीं है। ऐसे में शिव गोविंद पर लगाए गए आरोप सिद्ध नहीं होते हैं। वादी की ओर से पंजीकृत कराया गया मुकदमा एवं घटनाक्रम असत्य प्रतीत होता है। ऐसे में शिव गोविंद को दोषमुक्त किया जाता है।