भैये चुप रहेगा भैये आज शाहपुर से उड़ते-उड़ते जमीं पर आई बात सुना रहा है। वहां महल वाले बड़े जतन से फूल खिलाने आए थे पर पन्ना बाबू को सुहाते नहीं हैं। अपुन की गंगा जी वाली सड़क की शिला रखने दिल्ली वाले आए थे। अपुन ने बड़े-बड़े पोस्टरों में छुटभैयों के भी चेहरे देखे। बड़ी हसरतों से तलाशा पर महल वालों का पत्ता साफ था। जासूसों को लगाया तो एक कान में फुसफुसाया कि पन्ना बाबू के तंबू में बात चल रही है कि गांधी जी छाप नहीं आए, इसलिए फोटो भी नहीं छपवाए। अब एक बार फिर एक ब्रासर आ गया है पर महल वालों की सूरत दिखाई नहीं दे रही है। कनबतियां हो रही हैं कि महल वालों को अगला दाव दिखाया है। अरे नामुरादो, ऐसा ना कहो। ये कमल दल है। कोई पन्ना किसी मोती को चित नहीं कर पाता। वैसे भैये को महल वालों से एक बात कहनी है। सुन लो और समझ लो दाढ़ी वालों को क्लीन सेव में तो सदा तनी रही है। सबकी अपनी-अपनी जगह हर बात में बनी है। बस, जनता की सुनते रहो, मैदान जम जाएगा। पन्ना को भी मोती का मूल्य पता चल जाएगा। छोटा बच्चा जानकर मत समझाना

चचा के बरेली वाले कभी बड़े तैराक थे। पर कहावत है कि पानी की सही थाह न ले पाने पर तैराक ही डूबते हैं। भतीजे को छोटा बच्चा समझ बैठे। अब चचा-भतीजे की सुलह हो गई तो, वीर जी का मैदान छिन गया है। रात-रात भर निंदिया नहीं आई पर यह बात भी समझ नहीं पाई कि कहां अपने दंड चलाएं। टिकटों की बातों तक तो उम्मीदों पर सपने कायम थे। बता रहे थे सब ठीक हो जाएगा लेकिन अब तो आंगन लुट गया है। एक फुनुवा आया था, खबरची कह रहा था कि अब हाथ का साथ पकड़ेंगे। क्या करें, वीर जी। सब दिनन का फेर है। भीलन लूटीं गोपिका, वही अर्जुन, वही बाण।

चुनाव कुंभ का मेला नहीं

झुमके वाली छावनी में लाटरी वाले नेताजी ने बहुत दम लगाया पर टिकट हाथ नहीं लग पाई। अरे नेताओं से अफसरों तक पर आ गए। कमल वाली सरकार में राजधानी में जमे बड़े वाले अफसर से दम तक लगवा लिया परंतु लाल टोपी वाले भैयाजी ने कान तक न लगाए। अब क्या करें, बर्फ जमने वाली ठंड में सड़कें बनवा रहे थे। अब इनका क्या होगा। इसका मुनाफा तो राजनीतिक दुश्मन उठाएंगे। कोई बात नहीं लाटरी वालो। राजनीति का खेल ही ऐसा है। पांच साल पहले की याद करो चार साल पहले हाथी छोड़कर ऐसे ही कमल दल थामा था। भैये की सलाह है कि कुछ दिन चैन से जिओ। चुनाव कोई कुंभ का मेला थोड़े ही हैं, अरे अगले साल निगम वाले आएं। 2025 में दिल्ली जाने का मौका होगा। अंत में

लाल टोपी वाले गंगा किनारे वाले शहर में मुश्किल में पड़े हैं। सदर का मामला ऐसा अटका है कि कोई सुलझा नहीं पा रहा है। सैफई वाले भैया हाथी से सवार ले आए पर जेल वाले नेताजी का भी तो जलवा है। अब टीपू भैया को बहुत समझा रहे हैं लेकिन वह टस से मस नहीं हो रहे। अरे, भाई जेल में हैं तो क्या रामपुरी जुबान से सारे काम वहीं से हो जाते हैं। परंतु इस चक्कर में अपने नरक विकास वाले बम-बम हैं, कह रहे हैं खुद ही लड़कर निपट जाएंगे।

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